‘मो. शाहिद इतनी जल्दी चले जाएंगे विश्वास नहीं होता। अभी दो माह पहले ही उन्होंने मुझसे नैनीताल घूमने और देहरादून स्पोर्ट्स कॉलेज साथ चलने का वादा कर गए थे। शाहिद तो हर वादा निभाते थे, फिर क्यों यह वादा तोड़ गए।’ यह कहना है कि 1985 से 1988 तक मो. शाहिद के साथ हॉकी खेलने वाले ओलंपियन राजेंद्र रावत का।
अर्जुन अवार्डी मो. शाहिद के निधन से गमगीन ओलंपियन राजेंद्र रावत ने फोन पर हुई बातचीत में बताया कि न तो ऐसा खिलाड़ी भारतीय हॉकी में कभी हुआ और न ही होगा। मैदान में उनकी स्पीड का कोई सानी नहीं था। यूरोपियन टीम मो. शाहिद के नाम से डरती थीं।
1985 में मुझे भी मो. शाहिद के साथ खेलने का मौका मिला। मैदान में वह हमारे कप्तान नहीं, बल्कि हमारे भाई साहब हुआ करते था। उन्होंने भी हम लोगों को हमेशा छोटा भाई माना। 1985 में मैने उनके साथ पाकिस्तान में चार टेस्ट मैच, चैंपियन ट्रॉफी, एशियन गेम्स में खेला। इसके बाद 1986 में हमने साथ-साथ वर्ल्ड कप खेला।
पलभर में गोल पोस्ट से डी तक भाई साहब (मो. शाहिद) गेंद लेकर पहुंच जाते थे। उनकी फुर्ती और स्टेमिना देखकर विदेशी खिलाड़ियों के साथ हम भी चकित रह जाते थे। इसके बाद 1988 में मैने उनके साथ ओलंपिक में खेला। इतना बड़ा खिलाड़ी होने के बाद भी उनमें घमंड बिल्कुल भी नहीं था। बनारस की हॉकी को ऊंचाइयों तक ले जाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।
मो. शाहिद का निधन भारतीय हॉकी के लिए अपूर्णनीय क्षति है। वह एक महान खिलाड़ी थे।
- पंकज रावत, कोच स्पोर्ट्स कॉलेज
मो. शाहिद को हमने खेलते तो नहीं देखा पर कोच सर से काफी सुना है। उनका असमय जाना हाकी के लिए बड़ा नुकसान है।
- मितेश सिंह, हॉकी खिलाड़ी स्पोर्ट्स कॉलेज
मो. शाहिद हर खिलाड़ी के लिए एक गार्जियन की तरह थे। उन्होंने हॉकी को नई ऊंचाई तक पहुंचाया, मेरे दादा भी उनके खेल
के मुरीद थे।
- अभिषेक, हॉकी खिलाड़ी स्पोर्ट्स कॉलेज
उन्होंने स्पोर्ट्स कॉलेज आने की बात कही थी, हमें लगा हमें काफी कुछ उनसे सीखने को मिलेगा। पर उनका यूं चले जाना
हमारे लिए दुखद है।
- राजीव कुमार, हॉकी खिलाड़ी स्पोर्ट्स कॉलेज
मो. शाहिद का निधन भारतीय हॉकी के लिए बहुत बड़ा नुकसान है, जिसकी भरपाई मुश्किल है।
- विजय, स्पोर्ट्स कॉलेज
हमने कभी उन्हें देखा तो नहीं है, लेकिन भारतीय हॉकी में मो. शाहिद बहुत बड़ा नाम थे।
- प्रदीप बिष्ट, स्पोर्ट्स कॉलेज