धुंध की समस्या झेलनी पड़ रही
मानसून से पहले जब तेज हवा का सीजन शुरू होता है, तो प्रदूषक तत्व दो से तीन दिन में हिमालय क्षेत्रों में हवा के साथ पहुंच जाते हैं। उन्होंने बताया कि शीतकाल में तापमान कम होने से यह प्रदूषक तत्व घाटी क्षेत्रों में घूमते रहते हैं। इस वजह से घाटी क्षेत्रों में लोगों को धुंध की समस्या झेलनी पड़ती है।
ग्रीष्मकाल में यह तत्व उच्च हिमालय क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। जो ग्लेशियरों की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। इसलिए सभी सरकारों को मिलकर कार्बन व हानिककारक तत्वों का उत्सर्जन रोकने के लिए नीति बनानी होगी। वाहनों का कम से कम इस्तेमाल होना चाहिए। साथ ही ऐसे ईंधन का प्रयोग करना होगा, जो कम कार्बन उत्सर्जन करे। संवाद
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ब्लैक कार्बन का जो डाटा मिला है, वह काफी खराब स्थिति को बयां कर रहा है। ग्रीष्मकाल में 4 से 6 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। अक्टूबर में यह लगभग 12-15 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुंच गया है। यानि कि दो से तीन गुना वृद्धि हुई है। इसकी वजह वाहनों का ईंधन, पराली जलाना और अन्य गतिविधियां हैं। -डॉ. अतुल कुमार श्रीवास्तव, आईआईटीएम दिल्ली के वरिष्ठ वैज्ञानिक