डीबीएस कॉलेज का इतिहास
अधिकारी हो या मंत्री, डीबीएस की अलग पहचान
93 छात्रों के साथ वर्ष 1961 में शुरू हुआ था कॉलेज
माई सिटी रिपोर्टर
देहरादून। अधिकारी हो या मंत्री, वैज्ञानिक हो या सैन्य अफसर। डीबीएस पीजी कॉलेज के इतिहास में एक-एक छात्र का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। शहर के इस नामी कॉलेज की शुरुआत वर्ष 1961 में 93 छात्रों के साथ हुई थी।
डीबीएस (दयानंद बृजेंद्र स्वरूप) कॉलेज तब दो कमरों में संचालित होता था। उसके तीन साल के भीतर यहां बीएससी की शुरुआत हुई। देखते ही देखते यह सफर 58 साल पूरे कर गया। इस लंबे अंतराल में डीबीएस का यूं ही नाम नहीं बना। कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. वीसी पांडेय का कहना है कि सिविल सेवा हो या पॉलिटिक्स, साइंस हो या सेना। हर जगह डीबीएस के छात्रों ने सफलता का परचम फहराया है। उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. डीपी जोशी, एनआईआरएम के डायरेक्टर डॉ. पीसी नवानी, आईआरडीई निदेशक डॉ. एसएस नेगी से लेकर मेडिकल के क्षेत्र में सीएमआई के एमडी एवं अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. आरके जैन, आईएएस केएन भटनागर, सुरेश चंद्र मयाल, आईआरएस आरके शर्मा तक तमाम छात्रों ने नाम कमाया है। हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बीएस वर्मा, पुलिस अधिकारी, बैंकिंग अफसर, सेना के अफसर देने के मामले में डीबीएस का अपना एक मुकाम है। हर साल यहां के छात्र गढ़वाल विवि की मेरिट में शामिल होते हैं।
इनसेट
शहर को अलर्ट करता था डीबीएस का सायरन
डीबीएस पीजी कॉलेज के प्रिंसिपल कार्यालय के ठीक ऊपर एक सायरन लगा हुआ है। यह करीब 50 साल पहले सरकार ने लगाया था। इसका मकसद था कि अचानक कोई आपातकाल होने पर शहरवासियों को सतर्क किया जा सके। इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी के इस दौर में भी सरकार इस सायरन का लगातार रख-रखाव करती है।