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हिमालय अब और अधिक आपदाओं की जद में, 11 हिमालयी राज्यों के सामने चुनौती

Thu, 25 Jul 2019 01:35 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : फाइल फोटो
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प्लेट मूवमेंट और मौसम में बदलाव के कारण उत्तराखंड सहित अन्य हिमालयी राज्य अब भूकंप, भूस्खलन, अतिवृष्टि जैसी आपदाओं की और अधिक मार सहन कर रहे हैं। आपदाओं से निपटने के लिए सभी राज्यों के सामने एक मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र को विकसित करने की चुनौती है। 28 जुलाई को मसूरी में आयोजित हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सामने उत्तराखंड ने इसी चुनौती से पार पाने के लिए साथ आने का सुझाव पेश करने की तैयारी की है।

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पिछले 120 सालों में हिमालयन क्षेत्र छह बड़े भूकंपों की मार सहन कर चुका है। जीपीएस से हो रही निगरानी से जाहिर हो रहा है कि इंडियन प्लेट करीब 51 एमएम प्रति वर्ष की दर से तिब्बत की ओर खिसक रही है। इससे समूचा हिमालयी क्षेत्र भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील हो गया है। कई क्षेत्र ऐसे हैं जिन्होंने पिछले 200 सालों में बड़े भूकंपों का सामना नहीं किया है। ऐसे में भूकंप को लेकर संवेदनशीलता अधिक हो गई है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के कारण भी समूचा हिमालयन क्षेत्र अतिवृष्टि से लेकर भूस्खलन, फ्लेश फ्लड जैसी आपदाओं की चपेट में हैं। 

जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड सहित अन्य हिमालयी राज्य आर्थिक रूप से इतने सक्षम भी नहीं हैं कि अपने दम पर इन आपदाओं से निपट सकें। इस पर इन्हें 2030 तक सतत विकास लक्ष्य (गरीबी उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण, जोखिम को सहन करने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास, शहरों और मानव बस्तियों को सुरक्षित बनाना, वन प्रबंधन) के लक्ष्य भी हासिल करने हैं। ऐसे में इन राज्यों के सामने एक दूसरे की मदद करने के अलावा कोई अन्य विकल्प भी नहीं है। 
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आपदा प्रबंधन तंत्र की एक बड़ी चुनौती पुनर्वास की भी है। आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण हर साल बढ़ रहे प्रभावितों को सुरक्षित आवास और अन्य सुविधाएं देने में सरकारें स्वयं को सक्षम नहीं पा रही हैं। यही एक बिंदु हैं जहां हिमालयी राज्यों को एक जुट होकर केंद्र से अधिक आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने को कहा भी जा रहा है। मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के लिए उत्तराखंड ने कॉमन एजेंडे का प्रस्ताव भी तैयार कर लिया है।

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उत्तराखंड में पुनर्वास की स्थिति

प्रभावित गांव 395
पिछले दस साल में विस्थापित किए गए गांव-2, खर्च करीब 85 लाख
अत्यधिक संवेदनशील गांव जिनका पुनर्वास किया गया-21, खर्च करीब 25 करोड़
2012 से अब तक पुनर्वासित किए गए परिवार- 609, खर्च 17.94 करोड़

पुनर्वास में समस्या
-जमीन की उपलब्धता का न होना
-संसाधनों की कमी, करीब दस हजार करोड़ की जरूरत

आपदाएं राज्यों की सीमाओं को नहीं मानती। यह भी साफ है कि हिमालयी राज्य आपदाओं के मामले में एक जैसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। आपदाओं की संख्या और मारक क्षमता में भी इजाफा हो रहा है। ऐसे में सभी राज्यों के बीच आपदाओं को लेकर सूचनाआें के आदान प्रदान का मजबूत नेटवर्क होना चाहिए। राज्यों को समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण का तंत्र भी विकसित करना होगा। 
- पियूष रौतेला, अधिशासी निदेशक, राज्य आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र 

पिछले 120 सालों में आए विनाशकारी भूकंप
शिलांग, वर्ष  1887,  तीव्रता 8
कांगड़ा, वर्ष 1905, तीव्रता 8.2
बिहार-नेपाल, वर्ष 1934, तीव्रता 8.2
आसाम , वर्ष 1950, तीव्रता 8.6
कश्मीर, वर्ष 2005, तीव्रता 7.6
उत्तरकाशी, वर्ष 1991, तीव्रता 6.7
चमोली, वर्ष 1999, तीव्रता 6.4

ये है उत्तराखंड की ओर से सम्मेलन में रखे जाने वाला कॉमन एजेंडा..
1: राज्य आपदा प्रबंधन बल के लिए सभी राज्यों का बजट बढ़ाया जाए।
2: आपदा पुनर्वास नीति बनाई जाए और इससे संबंधित बजट बढ़ाया जाए।
3: सभी राज्यों के लिए आपदा न्यूनीकरण फंड की व्यवस्था की जाए।
4: भूकंप जोखिम न्यूनीकरण फंड का गठन किया जाए।
5: रिकवरी एवं रिकंस्ट्रशन फंड की व्यवस्था की जाए।
6: आपदा प्रभावितों को बीमा योजनाआें के दायरे में लाया जाए।
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