2013 की केदारनाथ आपदा थी जिसने हिमालयी राज्यों को सकल पर्यावरणीय उत्पाद या जीईपी की ओर कदम बढ़ाने के लिए विवश किया था। इस आपदा के बाद तत्कालीन प्रदेश सरकार ने जीईपी को प्रदेश में लागू करने के लिए कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी की बैठकें भी हुईं और फिर यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
कुछ समय पहले ही भारतीय वन्य जीव संस्थान में जीईपी को लेकर प्रधानमंत्री के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार की उपस्थिति में बैठक भी हुई और जीईपी के लिए फिर से कदम बढ़ाए गए। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश सरकार के स्तर से इस पर काम भी जारी है।
इसमें इस समय जीईपी को लेकर विभिन्न संस्थाओं से बात की जा रही है। हैस्को के संस्थापक निदेशक अनिल जोशी के मुताबिक कोशिश यह है कि जीईपी या सकल पर्यावरणीय उत्पाद इस तरह से विकसित किया जाए कि उसे व्यवहारिक रूप से लागू किया जा सके।
जीडीपी बढ़ाने में पर्यावरण का नुकसान कम करना बहुत जरूरी
हिमालयी क्षेत्र में जीडीपी को बढ़ाते हुए पर्यावरण के नुकसान को कम से कम करना बहुत जरूरी है। ऐसा वर्तमान को ही नहीं बल्कि भविष्य को भी ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। हमारे यहां ग्रीन जीडीपी की बात तो खूब होती है लेकिन उसको समझने और उस पर अमल करने की कोशिश कम ही होती है। यह अब सभी स्वीकार कर रहे हैं कि हिमालय बेहद संवेदनशील है। जलवायु परिवर्तन और अन्य कारणों से यहां का पर्यावरण भी अति संवेदनशील है।
यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि हिमालय का प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है। हिमालय पानी का सबसे बड़ा स्रोत है। यह जैव विविधिता का भंडार है। कार्बन सिंक है। इसका नुकसान मतलब सबका नुकसान। जीडीपी को हम पूरी अर्थव्यवस्था का आकलन मान सकते हैं। ऐसे में ग्रीन जीडीपी का मतलब है अर्थव्यवस्था को इस तरह से आगे बढ़ाना कि पर्यावरण का नुकसान कम से कम हो। दूसरे शब्दों में अर्थव्यवस्था में पर्यावरण के नुकसान का आकलन कर उसे घटा देें तो ग्रीन जीडीपी निकल आएगी। इस पर काम होना चाहिए और हिमालय के संदर्भ में तो यह और भी जरूरी है। 2007 में तत्कालीन सरकार ने नेशनल ग्रीन अकाउंटिंग की बात की थी। यह मामला तब से उठा नहीं। इस तरह से देखा जाए तो ग्रीन जीडीपी को जीडीपी का करेक्शन कहा जा सकता है। - प्रोफेसर बीके जोशी, निदेशक दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, पूर्व कुलपति कुमाऊं विश्वविद्यालय