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जल संकट की ओर बढ़ता हिमालय, ग्लेशियरों और नदियों के क्षेत्र में तेजी से सूख रहे प्राकृतिक जल स्रोत

Mon, 02 Sep 2019 02:32 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
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प्रतीकात्मक
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थर्ड पोल के रूप में पहचान रखने वाले हिमालय में अब पानी की कमी महसूस की जा रही है। मौसम में बदलाव और अन्य कारणों से ग्लेश्यिरों के घटने की बात हो रही है। इन सब के बीच में एक सवाल लगातार कौंधता है कि प्रकृति की ये अनमोल धरोहर कब तक हमारे लिए अपने को अर्पित करते रहेंगे। इनका उपयोग करने की लगातार कोशिश हुई लेकिन इनको समझा कम गया। जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। इस जल संकट से निजात पाने के लिए ग्लेशियरों, नदियों, जल स्रोतों का सम्मान करने और उनकी सीमाओें का अतिक्रमण न करने की जरूरत है।

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ग्लेश्यिरों और नदियों के लिए जाने जाते हिमालय को अब पानी की कमी का सामना भी करना पड़ रहा है। ग्लेश्यिरों के पिघलने को समझने की कोशिश की जा रही है लेकिन एक बात साफ तौर पर सामने आ रही है कि प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। कुछ में जल का प्रवाह कम हो गया है। हिमालय की सेहत का अंदाजा ग्लेशियरोें, नदियों, जल स्रोतों की स्थिति से भी लगाया जा सकता है। 2013 में केदारनाथ आपदा के बाद चोराबाड़ी ताल के टूटने के बाद प्रदेश में अचानक ग्लेशियर को लेकर खोजबीन में तेजी आई। अब कहा जा रहा है कि ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और ऐसे में हिमालय क्षेत्र में नई झीलें भी बन रही हैं। इतना होने पर भी ग्लेशियरों को लेकर अभी बहुत अधिक जानकारी जुटाई नहीं जा सकी है। दूसरी ओर, प्राकृतिक जल स्रोतों को लेकर उदासीनता ही है।

नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में करीब 50 प्रतिशत प्राकृतिक जल स्रोत सूख गए हैं। ये वही जल स्रोत हैं जिन्हें नौलों, धारों के रूप में पूजा जाता रहा है। एक खासी आबादी पानी के लिए इन जल स्रोतों पर निर्भर है। हिमालय दस प्रमुख नदियों के स्रोत हैं। ये नदियां ही हैं जो जल विद्युत परियोजनाओं के जरिए बिजली देती है, खेतों को सिंचाई के लिए पानी देती हैं और अन्य घरेलू जरूरतों को पूरा करती हैं। इन नदियों का अस्तित्व भी ग्लेशियरों की सेहत पर बहुत कुछ निर्भर करता है। 
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जम्मू कश्मीर 
ग्लेशियरों के मामले में जम्मू कश्मीर और लद्दाख का क्षेत्र खासा उर्वर है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. डीपी डोभाल के मुताबिक जम्मू कश्मीर और लद्दाख के क्षेत्र में 5000 से ज्यादा ग्लेशियर हैं। हाल ही में शोधकर्ताआें ने पाया कि पहलगांव से करीब 35 किेलोमीटर दूर कोलाहोई ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। यह ग्लेशियर ही है जिससे क्षेत्र की बड़ी सिंधु नदी को पानी मिलता है। यह ग्लेशियर ही है जो लिड्डर नदी का स्रोत भी है। जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ एन्वायरमेंट एंड डेवलपमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस क्षेत्र में अधिकतर ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं लेकिन कुछ ग्लेश्यिर ऐसे भी हैं जिनका विस्तार हो रहा है। विस्तार पाने वाले ग्लेशियरों में मिन्यापेन और हस्सनाबाद ग्लेशियर प्रमुख हैं।

हिमाचल प्रदेश
आईसीमोड की ओर से हाल ही में किए गए सर्वे के मुताबिक यहां करीब 3600 ग्लेशियर हैं। जीबी पंत इंस्टीट्यूट ने हिमाचल में बारा शिग्री और सोनापानी ग्लेशियर के अध्ययन में पाया कि ये ग्लेशियर पिछले कुछ समय में सिकुड़े हैं। 

उत्तराखंड
डा. डीपी डोभाल के मुताबिक उत्तराखंड में 900 से अधिक ग्लेयिशयर एक अध्ययन में रिकार्ड किए गए। प्रदेश में भी ग्लेश्यिर के सिकुड़ने की बात सामने आ रही है। जीबी पंत के अध्ययन के मुताबिक यहां ग्लेश्यिरों के सिकुड़ने की दर उतनी नहीं है जितनी की विश्व के अन्य क्षेत्रों में है। पिछले कुछ समय से गोमुख ग्लेशियर के मुहाने के पीछे खिसकने की बात सामने आई है। 
 

ग्लेशियर कई तरह से महत्वपूर्ण हैं हमारे लिए 

ग्लेशियर पानी के स्रोत भी हैं। एक दूसरा पहलू भी है जिसकी कम बात होती है। ग्लेशियर मौसम को नियंत्रित (क्लाइमेट रेग्युलेटर) भी करते हैं। इन सब कारकों को देखते हुए ग्लेशियरों को बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है। ऐसे देखा जाए तो हमारी निर्भरता ग्लेश्यिरों पर बहुत अधिक हैं। पिछले कुछ समय में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर चर्चा के केंद्र में आए हैं। ग्लेशियरों का बढ़ना या घटना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। 

ग्लेशियरों के घटने और उनके तेजी से पिघलने की बात हो रही है
ग्लेशियरों के बढ़ने या घटने के कई कारण हैं। मैं फिर कह रहा हूं कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। कुछ प्रभाव मौसम के बदलाव का भी है। जितनी बर्फ गिरेगी और यह जितने समय तक रुकी रहेगी यह उसके ऊपर भी निर्भर करता है। पिछले कुछ समय से मौसम में बदलाव आया है। गर्मी के मौसम की टाइम लाइन में इजाफा हो रहा है। हम कह सकते हैं कि गर्मी का मौसम विस्तार पा रहा है। इसके उलट सर्दी का मौसम घट रहा है। ग्लेश्यिरों का बनना एक लंबी प्रक्रिया है।

ग्लेश्यिरों के पिघलने से नदियों में पानी पर भी प्रभाव पड़ेगा
 ग्लेश्यिरों के पिघलने से नदियों का पानी पहले बढ़ेगा फिर एक पीक प्वाइंट आने के बाद उसमें कमी आनी शुरू हो जाएगी। ग्लेश्यिरों से निकलने वाली नदियों में पानी बहुत हद तक उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फबारी पर भी निर्भर करता है। बर्फबारी कम होगी तो नदियों पर इसका फर्क पडे़गा।

आगे किस तरह की चुनौतियां हैं
कहा तो यह भी जा रहा है कि मिनी आइस ऐज आने वाला है। ग्लेशियरों पर अभी अध्ययन किया जाना बाकी है।  
(डॉ. डीपी डोभाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से बातचीत के आधार पर)
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पानी की ये है स्थिति
30 लाख जल स्रोत हैं भारतीय हिमालय क्षेत्र में। करीब 20 करोड़ लोग इन जल स्रोतों पर निर्भर हैं।  करीब पांच करोड़ लोगों की निर्भरता तो 12 राज्यों में ही है। इतना होने पर भी जल स्रेातों की ओर कम ही ध्यान दिया गया है। 
50 प्रतिशत जल स्रोत सूख गए हैं। हाल ही में नीति आयोग की ओर से जारी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। इस संकट से उभरने के लिए नीति आयोग ने स्प्रिंगशेड रिवाइवल योजना भी बनाई है। नीति आयोग का स्पष्ट मानना है कि जल स्रोतों के सूखने का सीधा असर नदियों में पानी की मात्रा पर भी पड़ेगा। मसलन गंगा नदी में 90 प्रतिशत पानी की पूर्ति इन जलस्रोतों से ही होती है।  यूएनडीपी के अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड में करीब 260000 प्राकृतिक जल स्रोत हैं और 90 प्रतिशत लोग इन प्राकृतिक जल स्रोतों पर पानी के लिए निर्भर हैं। 

थर्ड पोल...
हिंदु कुश हिमालय क्षेत्र भारत, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मयामार, भूटान, बांगलादेश, नेपाल आदि के 43 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ क्षेत्र है। ध्रुवों के अलावा यह विश्व में सबसे ज्यादा बर्फ को धारण करने वाला क्षेत्र है और इस वजह से थर्ड पोल के नाम से जाना जाता है।
14 चोटियां हैं इस क्षेत्र में 8000 मीटर से अधिक ऊंचाई की। 
600 से ज्यादा भाषाओं और बोलियों का क्षेत्र है यह। एक समृद्ध सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है यह क्षेत्र
10 मुख्य नदियों के स्रोत हैं हिमालय के ग्लेशियर। झेलम, व्यास, चिनाब, रावी, सतलुज, सिंधु, गंगा, यमुना, ब्रहमपुत्र, स्पिति। इन नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में बड़ी आबादी रहती है और ये नदियों इन क्षेत्रों के लिए लाइफ लाइन भी हैं।
130 करोड़ लोग इन नदियों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं। यह विश्व की आबादी का करीब 20 प्रतिशत माना जाता है। 
54 हजार ग्लेश्यिर रिपोर्ट किए गए हैं इस क्षेत्र में। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटिड माउंटेन डेवलपमेंट की हाल ही के एक अध्ययन के मुताबिक इस क्षेत्र में 6000 घन किलोमीटर बर्फ (आइस) जमा है। यह जमी हुई बर्फ इस क्षेत्र में होने वाली बारिश का तीन गुना है।
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