ग्लेशियर पानी के स्रोत भी हैं। एक दूसरा पहलू भी है जिसकी कम बात होती है। ग्लेशियर मौसम को नियंत्रित (क्लाइमेट रेग्युलेटर) भी करते हैं। इन सब कारकों को देखते हुए ग्लेशियरों को बेहद महत्वपूर्ण माना जा सकता है। ऐसे देखा जाए तो हमारी निर्भरता ग्लेश्यिरों पर बहुत अधिक हैं। पिछले कुछ समय में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर चर्चा के केंद्र में आए हैं। ग्लेशियरों का बढ़ना या घटना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।
ग्लेशियरों के घटने और उनके तेजी से पिघलने की बात हो रही है
ग्लेशियरों के बढ़ने या घटने के कई कारण हैं। मैं फिर कह रहा हूं कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। कुछ प्रभाव मौसम के बदलाव का भी है। जितनी बर्फ गिरेगी और यह जितने समय तक रुकी रहेगी यह उसके ऊपर भी निर्भर करता है। पिछले कुछ समय से मौसम में बदलाव आया है। गर्मी के मौसम की टाइम लाइन में इजाफा हो रहा है। हम कह सकते हैं कि गर्मी का मौसम विस्तार पा रहा है। इसके उलट सर्दी का मौसम घट रहा है। ग्लेश्यिरों का बनना एक लंबी प्रक्रिया है।
ग्लेश्यिरों के पिघलने से नदियों में पानी पर भी प्रभाव पड़ेगा
ग्लेश्यिरों के पिघलने से नदियों का पानी पहले बढ़ेगा फिर एक पीक प्वाइंट आने के बाद उसमें कमी आनी शुरू हो जाएगी। ग्लेश्यिरों से निकलने वाली नदियों में पानी बहुत हद तक उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फबारी पर भी निर्भर करता है। बर्फबारी कम होगी तो नदियों पर इसका फर्क पडे़गा।
आगे किस तरह की चुनौतियां हैं
कहा तो यह भी जा रहा है कि मिनी आइस ऐज आने वाला है। ग्लेशियरों पर अभी अध्ययन किया जाना बाकी है।
(डॉ. डीपी डोभाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से बातचीत के आधार पर)
पानी की ये है स्थिति
30 लाख जल स्रोत हैं भारतीय हिमालय क्षेत्र में। करीब 20 करोड़ लोग इन जल स्रोतों पर निर्भर हैं। करीब पांच करोड़ लोगों की निर्भरता तो 12 राज्यों में ही है। इतना होने पर भी जल स्रेातों की ओर कम ही ध्यान दिया गया है।
50 प्रतिशत जल स्रोत सूख गए हैं। हाल ही में नीति आयोग की ओर से जारी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। इस संकट से उभरने के लिए नीति आयोग ने स्प्रिंगशेड रिवाइवल योजना भी बनाई है। नीति आयोग का स्पष्ट मानना है कि जल स्रोतों के सूखने का सीधा असर नदियों में पानी की मात्रा पर भी पड़ेगा। मसलन गंगा नदी में 90 प्रतिशत पानी की पूर्ति इन जलस्रोतों से ही होती है। यूएनडीपी के अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड में करीब 260000 प्राकृतिक जल स्रोत हैं और 90 प्रतिशत लोग इन प्राकृतिक जल स्रोतों पर पानी के लिए निर्भर हैं।
थर्ड पोल...
हिंदु कुश हिमालय क्षेत्र भारत, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मयामार, भूटान, बांगलादेश, नेपाल आदि के 43 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ क्षेत्र है। ध्रुवों के अलावा यह विश्व में सबसे ज्यादा बर्फ को धारण करने वाला क्षेत्र है और इस वजह से थर्ड पोल के नाम से जाना जाता है।
14 चोटियां हैं इस क्षेत्र में 8000 मीटर से अधिक ऊंचाई की।
600 से ज्यादा भाषाओं और बोलियों का क्षेत्र है यह। एक समृद्ध सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है यह क्षेत्र
10 मुख्य नदियों के स्रोत हैं हिमालय के ग्लेशियर। झेलम, व्यास, चिनाब, रावी, सतलुज, सिंधु, गंगा, यमुना, ब्रहमपुत्र, स्पिति। इन नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र में बड़ी आबादी रहती है और ये नदियों इन क्षेत्रों के लिए लाइफ लाइन भी हैं।
130 करोड़ लोग इन नदियों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं। यह विश्व की आबादी का करीब 20 प्रतिशत माना जाता है।
54 हजार ग्लेश्यिर रिपोर्ट किए गए हैं इस क्षेत्र में। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटिड माउंटेन डेवलपमेंट की हाल ही के एक अध्ययन के मुताबिक इस क्षेत्र में 6000 घन किलोमीटर बर्फ (आइस) जमा है। यह जमी हुई बर्फ इस क्षेत्र में होने वाली बारिश का तीन गुना है।