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हिमालय दिवस 2019: सुरक्षा की पुरानी परंपरा दरकिनार, नई तकनीक अपनाने को नहीं तैयार

Sat, 07 Sep 2019 03:56 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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आपदा और हिमालय का गहरा नाता रहा है। अत्यधिक संवेदनशील पहाड़ पग-पग पर यहां बसने वालों की परीक्षा लेते रहे हैं। यही कारण है कि सौ साल के कई बड़े भूकंप को झेलने वाले कोटी बगान शैली के मकान यहां बनें, गांव सड़कों के किनारे नहीं, बल्कि नदियों, नालों से दूर ठोस चट्टानों पर बसे। लोगों ने जल प्रबंधन की बेहतरीन तकनीक विकसित की और खेती को भी इससे जोड़ा। यह भुलाया जा रहा है और आपदाओं से बचाव की नई तकनीकों को अपनाया नहीं जा रहा है....

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अब आपदा के साथ जीना सीखने को नए सिरे से अपनाना जरूरी
केदारनाथ की आपदा ने देश और दुनिया का ध्यान उत्तराखंड की ओर खींचा था। 2013 की घटना से ही हमें यह अहसास हुआ कि आपदा की भयावहता कितनी हो सकती है। इसके बाद से ही आपदा प्रबंधन को नए सिरे से सोचने, समझने और अमल में लाने की जरूरत महसूस की गई। इतना होने पर भी हिमालय अब नए सिरे से आपदा प्रबंधन के पाठ को पढ़ने की मांग कर रहा है। 

मौसम में बदलाव के कारण अब अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन के साथ ही कई और आपदाओं ने हमारे दरवाजे पर दस्तक देनी शुरू कर दी है। अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि भू कटाव की दर बढ़ सकती है और इसके गंभीर परिणाम होंगे। पर्वतीय क्षेत्रों को कभी छू न पाने वाले रोग अब यहां अपना घर बना रहे हैं। वनस्पतियों के विलुप्त होने की दर बढ़ रही है और जैव विविधता पर संकट है। बारिश अब कम समय में अधिक हो रही है और इसकी तीव्रता अधिक नुकसान पहुंचा रही है। इतना होने पर आपदा प्रबंधन का तंत्र अभी ढंग से आगे कदम बढ़ा भी नहीं पा रहा है। सरकार का फोकस आपदा हो जाने के बाद राहत और बचाव पर है और आपदा से नुकसान को कम करने के लिए अभी तैयारी आधी अधूरी है। 
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पुनर्वास की समस्या जस की तस 
आपदा प्रबंधन अधिनियम कहता है कि आपदा राहत एक तात्कालिक उपाय है। पुनर्वास का मतलब है कि प्रभावितों को उनकी पहले के जीवन स्तर तक पहुंचाया जाए। प्रदेश में अभी तक पुनर्वास की ठोस व्यवस्था नहीं हो पाई है। भूमि का उपलब्ध न होना इसका एक कारण बताया जा रहा है।
 

क्या-क्या करते थे हमारे पूर्वज

1. पानी और जंगल की ही समझ रही होगी कि ऊंचाई वाले इलाकों में लोगों ने देवी देवताओं के मंदिर बनाएं और आसपास के जंगल को इन देवी देवताओं को समर्पित किया। एक परंपरा के तहत उच्च हिमालयी क्षेत्र में उगने वाले ब्रह्मकमल को हाथों से नहीं बल्कि झुककर मुंह से तोड़ा जाता है। यह परंपरा कुछ हद तक इस फूल के अत्यधिक दोहन को रोकती है। 
2. भूमिगत जल की समझ का अगर अंदाजा लेना हो तो कुमाऊं के नौलों को देखा जा सकता है। जगह-जगह जमीन खोदकर बनाए गए ये नौले पानी के स्रोत हैं। कहीं-कहीं तो इन नौलाें की गहराई सात फीट तक पाई गई है। नौले बनाने के लिए निश्चित रूप से भूमिगत जल की उपलब्धता की समझ होनी जरूरी है। 
3.भूस्खलन को लेकर लोगों की समझ कितनी गहरी थी, इसका अंदाजा जल प्रबंधन और खेती आदि से लगाया जा सकता है। भूस्खलन वाले क्षेत्रों में आज भी ऊपरी क्षेत्रों में जंगली गूल बनी हुई मिलती हैं। मिल जुलकर इनकी मरम्मत की जाती थी। इसी तरह खेती हमेशा से ही सीढ़ीदार खेतों में की जाती रही। 
4. गांव हमेशा ऊंची पहाड़ियों पर और खेत नीचे नदी, नालोें के नजदीक बनाए जाते थे। लोगाें को अनाज ढोकर लाना मंजूर था लेकिन सुविधा के लिए नदी के किनारे बसना स्वीकार नहीं था। 
5. गढ़वाल और कुमाऊं के लोगों ने करीब हजार साल पहले ही भूकंप के साथ जीना सीख लिया था। कोटी बनाल शैली के छह मंजिला भवन इस बात के प्रमाण हैं। इसके बाद अचानक ही सीमेंट और लिंटर वाले भारीभरकम मकान बन रहे हैं। आपदा प्रबंधन विभाग अब सिखा रहा है कम लागत में भूकंपरोधी भवन कैसे बनाए जाएं, लेकिन इस तरह के भवन भी बहुत कम बन रहे हैं। 
 
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आपदा प्रबंधन : एहतियात को हमें अपनी आदत बनाना होगा 

क्या आपदाओं का प्रभाव बढ़ रहा है?
-अब ऐसा भी नही है कि हिमालय क्षेत्र अभी हाल ही में आपदाओं से प्रभावित होने लगा हो। 1880 में 18 सितंबर में नैनीताल में आए भूकंप से 151 लोग मारे गए थे। उस समय की जनसंख्या और परिस्थिति के हिसाब से यह बड़ा नुकसान था। इसी तरह छह सितंबर, 1893 को बिरही गंगा में बनी झील 26 अगस्त को टूटी थी। झील के टूटने से पहले ही चेतावनी जारी होने के कारण भारी नुकसान से बच गए थे। तुलनात्मक अध्ययन के लिए हमारे पास पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं। कारण यह भी है कि पहले घटनाओं को दर्ज करने की परंपरा नहीं थी। 

हिमालय को अब आपदाओं का घर भी कहा जा रहा है 
- इतना जरूर कहा जा सकता है कि संचार संपर्क बढ़ने के कारण अब आपदा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ गई है। हम स्थानीय स्तर पर घटित घटनाओं को दर्ज कर पा रहे हैं। हिमालय हमेशा से ही संवेदनशील रहे हैं और भूकंप, भूस्खलन की घटनाएं पहले भी होती रही हैं। हर साल मानसून की पहले से तैयारी की जाती है और लोगों को भी सुझाव दिया जाता है। 

आपदा या आपदा से नुकसान के लिए मानव कितना जिम्मेदार है
-बहुत हद तक नुकसान को बढ़ाने की भूमिका हमने ही तैयार की है। बांध या जलाशय बनाकर नदियों को हमने तालाब बना दिया। परंपरागत भवन शैली को छोड़कर अधिक नुकसान पहुंचाने वाली भवन शैली अपना ली। आपदा से नुकसान का अप्रत्यक्ष नुकसान का आकलन तो हो ही नहीं पा रहा है। बाहरी देशों में बीमा कवर बेहतर होता है तो बीमा कंपनियां बताती हैं कि कहां कितना नुकसान हुआ। हमारे यहां अभी बीमा कवर बहुत कम है। 

आपदा प्रबंधन में बेस्ट प्रेक्टिस क्या हैे?
-आपदा प्रबंधन की बेस्ट प्रेक्टिस ही यह है कि आपदा से प्रभावित प्रथम वर्ग या व्यक्ति (फर्स्ट रिस्पांसडर) जागरूक और आपदा का सामना करने में सक्षम हो। मुसीबत यह है कि सुरक्षा अभी हमारी आदत में ही शामिल नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा लोग हर साल सड़क दुर्घटनाओं में मारे जा रहे हैं। 

आपदा प्रबंधन की हमारी तैयारी कहां तक पहुंची?
2010 से शुरू कर 17 हजार लोगों को राहत और बचाव के लिए प्रशिक्षित किया गया है। हम दो साल में ब्लॉक स्तर पर मौसम का पूर्वानुमान जारी करने में सक्षम होंगे। भूकंप की पूर्व चेतावनी का तंत्र भी विकसित किया गया है, हालांकि इसमें 20 सेकेंड पहले ही चेतावनी मिल पा रही है। उत्तरकाशी की आपदा से साबित हुआ कि हमारा रिस्पांस टाइम बेहतर हुआ है। 
(पियूष रौतेला, अधिशासी निदेशक, आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र से बातचीत के आधार पर  )
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