1. पानी और जंगल की ही समझ रही होगी कि ऊंचाई वाले इलाकों में लोगों ने देवी देवताओं के मंदिर बनाएं और आसपास के जंगल को इन देवी देवताओं को समर्पित किया। एक परंपरा के तहत उच्च हिमालयी क्षेत्र में उगने वाले ब्रह्मकमल को हाथों से नहीं बल्कि झुककर मुंह से तोड़ा जाता है। यह परंपरा कुछ हद तक इस फूल के अत्यधिक दोहन को रोकती है।
2. भूमिगत जल की समझ का अगर अंदाजा लेना हो तो कुमाऊं के नौलों को देखा जा सकता है। जगह-जगह जमीन खोदकर बनाए गए ये नौले पानी के स्रोत हैं। कहीं-कहीं तो इन नौलाें की गहराई सात फीट तक पाई गई है। नौले बनाने के लिए निश्चित रूप से भूमिगत जल की उपलब्धता की समझ होनी जरूरी है।
3.भूस्खलन को लेकर लोगों की समझ कितनी गहरी थी, इसका अंदाजा जल प्रबंधन और खेती आदि से लगाया जा सकता है। भूस्खलन वाले क्षेत्रों में आज भी ऊपरी क्षेत्रों में जंगली गूल बनी हुई मिलती हैं। मिल जुलकर इनकी मरम्मत की जाती थी। इसी तरह खेती हमेशा से ही सीढ़ीदार खेतों में की जाती रही।
4. गांव हमेशा ऊंची पहाड़ियों पर और खेत नीचे नदी, नालोें के नजदीक बनाए जाते थे। लोगाें को अनाज ढोकर लाना मंजूर था लेकिन सुविधा के लिए नदी के किनारे बसना स्वीकार नहीं था।
5. गढ़वाल और कुमाऊं के लोगों ने करीब हजार साल पहले ही भूकंप के साथ जीना सीख लिया था। कोटी बनाल शैली के छह मंजिला भवन इस बात के प्रमाण हैं। इसके बाद अचानक ही सीमेंट और लिंटर वाले भारीभरकम मकान बन रहे हैं। आपदा प्रबंधन विभाग अब सिखा रहा है कम लागत में भूकंपरोधी भवन कैसे बनाए जाएं, लेकिन इस तरह के भवन भी बहुत कम बन रहे हैं।