विशेषज्ञों ने रखी मन की बात
ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय ग्लेशियर खतरे में है जिससे मानव जीवन भी खतरे में पड़ रहा है। प्रकृति हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है लेकिन हम लालच में अनियंत्रित दोहन कर रहे हैं। 80 के दशक में गोमुख ग्लेशियर का जो स्वरूप था आज वह नहीं रह गया है। वनों के अनियंत्रित दोहन के दुष्परिणाम स्पष्ट देखने को मिल रहे हैं। वर्तमान में जो आपदाएं आ रही हैं उसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। मिश्रित वनों को विकसित किया जाना चाहिए।
-प्रो. मधु थपलियाल, जंतु विज्ञान विभागाध्यक्ष, पीजी कालेज उत्तरकाशी।
2010 में जब हिमालय दिवस शुरू हुआ तो मुख्य मुद्दा यही था कि हम ऐसी हिमालय नीति की मांग करेंगे जिससे इस क्षेत्र के किसान व किसानी बच सके। हम जलवायु परिवर्तन को कितना भी दोषी मानें लेकिन बड़े निर्माण कार्यों ने हिमालय की रीढ़ कमजोर कर दी है। फलस्वरूप जंगल, पानी, खेती और चारागाह पर संकट खड़ा हो गया है। इसी वजह से लोग पहाड़ छोड़ शहरों की ओर रुख कर रहे हैं। छोटी-छोटी पन बिजली व हिमालय के आकार प्रकार के अनुसार सड़क निर्माण व तीर्थाटन, पर्यटन के विकास पर संवाद बनना जरूरी है।
-सुरेश भाई, पर्यावरणविद।
हिमालय व हिमालवासियों दोनों पर सकंट मंडरा रहा है। हिमालयवासियों की सुरक्षा के बिना हिमालय की सुरक्षा की कल्पना बेमानी है। इसके लिए अपने-अपने स्तर से विभिन्न प्रयोग किए जाने चाहिए। भोजन में स्थानीय फसलों से बने गढ़ भोज को शामिल किया जाना चाहिए। अपने जन्मदिन पर दिखावे के बजाय जलकुंड निर्माण जैसी सकारात्मक गतिविधि आयोजित करें। जंगली जानवरों को जंगलों में ही भोजन उपलब्ध हो इसके लिए बीज बम जैसे अभियान चलाए जाएं। स्थानीय बीजों के संरक्षण के लिए स्कूली स्तर पर भी गतिविधियां आयोजित की जाएं। हिमालयी संस्कृति व परंपराओं के संरक्षण से ही हिमालय को बचाया जा सकता है।
-द्वारिका प्रसाद सेमवाल, पर्यावरणविद।
ग्लेशियरों के संरक्षण के लिए सामूहिक रूप से प्रयास किए जाने चाहिए। विकास की दौड़ में हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्यों का प्रभाव हिमलय के पर्यावरण पर पड़ रहा है। स्थिति यह है कि ग्लेशियर दिन प्रतिदिन पीछे खिसकते जा रहे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर भी इस प्रभाव से अछूता नहीं है। चारधाम यात्रा के नाम पर उच्च हिमालयी क्षेत्र में जो अंधाधुंध निर्माण कार्य हो रहे हैं उन पर नियंत्रण लगाना होगा। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अनावश्यक मानवीय गतिविधियों व आवाजाही पर भी नियंत्रण की आवश्यकता है। ग्लेशियर क्षेत्र में मानवीय आवाजाही पूर्ण रूप से प्रतिबंधित होनी चाहिए।
- शांति ठाकुर, ग्लेशियर लेडी।
चामकोट गांव में बनेगा जल कुंड
कार्यक्रम के दौरान हिमालयी क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए जल कुंड बनाने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि हिमालय संरक्षण पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया तो जल संकट अधिक गहरा जाएगा। हिमालय क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण कार्यों से जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। अधिकांश जल स्रोत सूख गए हैं। कुछ सूखने के कगार पर हैं। इन जल स्रोतों को बचाने के लिए भी अहम प्रयास किए जाने चाहिए। जिस पर विचार करते हुए जलकुंड निर्माण का निर्णय लिया गया। जाड़ी संगठन के साथ मिलकर चामकोट गांव में जल कुंड का निर्माण किया जाएगा।
छात्रों से किया सीधा संवाद
कार्यक्रम में 200 से अधिक छात्र-छात्राओं ने प्रतिभाग किया। इस दौरान छात्र-छात्राओं ने विशेषज्ञों से सवाल भी किए। छात्र-छात्राओं ने नदियों का अस्तित्व बचाने, कूड़ा निस्तारण, बुग्यालों के संरक्षण, जल स्रोतों को रीर्चाज करने में युवाओं की भूमिका के संबंध में विशेषज्ञों से सवाल पूछे। छात्रों ने सवाल किया कि निर्माण कार्य के दौरान कैसे पेड़ों को बचाया जा सकता है। विशेषज्ञों ने सभी सवालों का जवाब देकर छात्रों की जिज्ञासा को शांत किया।
छात्र-छात्राओं ने दिए सुझाव
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही आबादी से नगरीकरण हो रहा है। पहाड़ पर कूड़ा निस्तारण एक गंभीर समस्या बन गई है। उत्तरकाशी में भी कूड़े का पहाड़ खड़ा हो गया है। इस समस्या के निराकरण के लिए हर घर से प्रयास किए जाने चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि हम घरों में कूड़ा कम करें। साथ ही सूखे और गीले कूड़े को अलग करने की आदत डालें।
-संध्या नौटियाल।
हिमालय क्षेत्र में पानी का संकट भी बढ़ रहा है। इसका कारण वनों का अत्यधिक दोहन व जंगलों की आग है। वनों के कटान पर नियंत्रण आवश्यक है। जंगलों को आग से बचाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी होगी। मिश्रित वनों का विकास भी कारगर साबित होगा।
- निधि पयाल।