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गांव बचाओ यात्रा का अहम मुद्दा होगा हिमालय

Sat, 24 Sep 2016 02:56 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, देहरादून
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अनिल जोशी - फोटो : AmarUjala
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हिमालय हमारी आध्यात्मिक चेतना आस्था, प्रेरणा का एक मजबूत संबल रहा है। यह हमें चुनौतियों से लड़ने की शक्ति और साहस भी प्रदान करता है। हिमालय जहां हमारे सामरिक महत्व को भी परिभाषित करता है, वहीं यह जीवनदायनी के रूप में भी सदियों से ऊर्जा का अक्षय भंडार भी है।
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हिमालय से निकलने वाली धाराएं एवं ग्लेशियर पर्यावरण संरक्षण संवर्धन की दृष्टि से ही नहीं, पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में भी इसका विशेष महत्व है। इस लिए हम यह भी कह सकते हैं कि मानव अस्तित्व रक्षा के लिए हिमालय की सुरक्षा भी अति आवश्यक है। पद्मश्री अनिल जोशी के नेतृत्व में दो अक्तूबर से प्रारंभ हो रही गांव बचाओ यात्रा में हिमालय का संरक्षण भी एक अहम मुद्दा रहेगा।

गांव बचाओ यात्रा से जुड़े अहम किरदारों में से एक डॉ. योगेश धस्माना (डिस्ट्रिक कॉऑर्डिनेटर नेहरू युवा केंद्र चमोली) कहते हैं कि हिमालय के कारण ही जैव-विविधता के संरक्षण में उत्तराखंड का अहम योगदान रहा है। देश को सर्वाधिक जल और ऑक्सीजन प्रदान करने वाला यह क्षेत्र प्रचुर संसाधनों के बावजूद जहां निर्धन बना हुआ है वहीं दूसरी ओर खनन, विशाल बांध परियोजनाओं के निर्माण और उच्च हिमालय बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण हिमालय कराह रहा है।
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माफिया लूट रहे हिमालय की संपदा
धस्माना कहते हैं कि उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद हमें यह आशा थी कि ग्रामीण विकास की आर्थिक नीतियां पर्यावरण संरक्षण के साथ जैव-विविधता को बढ़ाने वाली साबित होंगी, लेकिन रेत बजरी खनन के साथ ही वन माफिया विकास कार्यों की आड़ में जिस तरह हिमालय की संपदा का दोहन कर रहे हैं। उससे समूचे पहाड़ और हिमालय का भूगोल बदलने लगा है। वैज्ञानिक और समाज वैज्ञानिकों की चेतावनी के बावजूद उच्च हिमालय में भारी संख्या में पर्यटकों की आवाजाही, अनियंत्रित निर्माण कार्य, वनों का दोहन और खनन पर स्पष्ट नीति के अभाव में उत्तराखंड माफिया का सैरगाह बन गया है।

हिमालय की रक्षा के लिए हम सभी को जागृत होकर इसकी रक्षा के लिए जनप्रतिनिधियों से भी सवाल करने चाहिए। जनता के पास भी चुनावों में अपना एक एजेंडा होना चाहिए। पहाड़ में ख्ेाती-उद्यानिकी के साथ ही विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था के लिए पंचायतों को भी सशक्त बनाया जाना चाहिए।

उन्हें योजना निर्माण के साथ ही आर्थिक शक्तियां भी दी जानी चाहिए। ऐसा करके ही हम हिमालय को उसके मूर्त रूप में आने वाले वर्षों में देख सकेंगे। इससे भूगोल और मानव भी सुरक्षित और सुखी रह सकेगा। जरूरी है कि उत्तराखंड को उत्तर पूर्वी पर्वतीय राज्यों की तरह ‘सेवेंथ सिस्टर क्लब’ बना कर विशेष राज्य के तहत नियोजन की दृष्टि से भी पृथक सेल बनाया जाए। उत्तराखंड के सांसदों से भी अपील की जाती है कि वह संसद में इस विषय पर आगे आकर पहल करें ताकि घायल उत्तराखंड हिमालय को बचाया जा सके।
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