ज्यादा राजस्व और प्रति व्यक्ति आय होने के बावजूद उत्तराखंड अपने नागरिकों को वह सड़क और बिजली नहीं दे पा रहा है जो उसका पड़ोसी राज्य हिमाचल दे रहा है। अर्थ एवं संख्या निदेशालय की अध्ययन रिपोर्ट से यह बात खुलकर सामने आ रही है।
निदेशालय ने विभिन्न मानकों की कसौटी पर दोनों राज्यों को कसा है। इससे पहले विश्व बैंक की एक रिपोर्ट भी हिमाचल के गरीबी उन्मूलन अभियान की तारीफ कर चुकी है। पड़ोसी और एक जैसी स्थिति होने के कारण उत्तराखंड और हिमाचल की तुलना गाहे-बगाहे होती ही रहती है।
हिमाचल भी पर्वतीय राज्य है और वहां की भौगोलिक स्थिति बहुत कुछ उत्तराखंड से मिलती-जुलती है। अर्थ एवं संख्या निदेशालय के एक अध्ययन के मुताबिक कर राजस्व में उत्तराखंड अपने पड़ोसी राज्य से आगे ही रहा है। 2011-12 में उत्तराखंड का कर राजस्व 8482 करोड़ था तो हिमाचल का केवल 6331 करोड़।
इसी तरह स्थिर मूल्य पर उत्तराखंड का 2013-14 का सकल घरेलु उत्पाद 67927 करोड़ रुपये रहा है जबकि हिमाचल का 47255 करोड़। 2013-14 में उत्तराखंड की प्रति व्यक्ति आय 103349 और हिमाचल की 92300 रुपए रही है। यही हाल उत्पादकता का भी है। अनाज और तिलहन में उत्तराखंड की उत्पादकता अपने पड़ोसी राज्य से अधिक है।
इतना होने के बावजूद उत्तराखंड कई मामलों में हिमाचल से पीछे है। हिमाचल में प्रति लाख जनसंख्या पर सड़क की लंबाई 447 किलोमीटर है जबकि उत्तराखंड में यह केवल 377 किलोमीटर।जाहिर है कि हिमाचल में सड़कों का नेटवर्क उत्तराखंड के मुकाबले अधिक और बेहतर है।
इसी तरह प्रति व्यक्ति बिजली की उपलब्धता भी हिमाचल में अधिक है। हिमाचल में बिजली की प्रति व्यक्ति खपत 949 यूनिट है और उत्तराखंड में 820 यूनिट। बिजली की खपत को अगर रहन सहन से जोड़ कर देखा जाए तो साफ है कि हिमाचल अपने पड़ोसी राज्य से एक कदम आगे है। यह तब है जबकि उत्तराखंड में बिजली का उत्पादन हिमाचल से अधिक है।
कुछ समय पहले हीविश्व बैंक के एक अध्ययन से भी यह सामने आया था कि हिमाचल को 1970 के दौरान ही सुधार के कदम उठा लेने का फायदा मिला था। पर हिमाचल ने अपनी विकास दर को बना कर भी रखा। दूसरी ओर स्थिति यह है कि राज्य गठन के बाद से 2010 तक उत्तराखंड की विकास दर हिमाचल से अधिक रही। पर अब यह हिमाचल की तुलना में कम है।