समुद्र तल से दो हजार मीटर ऊंचाई वाले उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लैंडस्कैप की यह सूरत आने वाले सालों में शायद देखने को न मिले।
बर्फबारी के मनोरम दृश्य वाले ये इलाके जलवायु परिवर्तन के कारण तेज मानसूनी बारिश से बदल रहे हैं। तेज बारिश के कारण इन क्षेत्रों में भूस्खलन बढ़ गया है और यहां के ‘स्लोप’ ढहते जा रहे हैं, जिससे यहां के लैंडस्कैप तब्दील हो रहे हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन का असर उच्च हिमालयी क्षेत्र में अब नजर आने लगा है।
भटवाड़ी उत्तरकाशी के ऊपर वाले क्षेत्रों के अलावा अलकनंदा, भागीरथी घाटी के जो इलाके भारी बर्फबारी के लिए जाने जाते थे, अब वहां बारिश अधिक हो रही है। चमोली जिले की नीति घाटी में रिमझिम पानी गिरता था, लेकिन अब यहां मूसलाधार बारिश हो रही है।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में कार्य कर रहे वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानियों की रिपोर्ट में बताया गया है कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन की संख्या बढ़ती जा रही है। यहां अति संवेदनशील जोन की संख्या भी बढ़ी है। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से यहां बर्फबारी घटी है। मानसून की तेजी यहां 50 फीसदी से अधिक बढ़ गई है, जिससे बारिश यहां 50 से 70 फीसदी तक बढ़ी है। बर्फ से ढके रहने वाले यहां के स्लोप ढहने लगे हैं। स्लोप की श्रंखला टूटती जा रही है।
विज्ञानियों का कहना है कि स्लोप ढहकर किस रूप में तब्दील होंगे, यह तो तय नहीं है, लेकिन पुराना लैंडस्कैप बदल जाएगा। उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर भी मौसम के इस बदलाव से प्रभावित हो रहे हैं। उनका कहना है कि अधिकांश ग्लेशियर ट्रांस हिमालयन जोन में हैं। वहां अभी जलवायु परिवर्तन का इतना अधिक प्रभाव नहीं है।
मानसूनी बारिश के बढ़ने से भूस्खलन बढ़ रहा है। स्लोप गिरेंगे तो वहां के लैंडस्कैप में भी फर्क आएगा। बर्फबारी वाले इलाकों में अब बारिश अधिक हो गई है।
- डॉ. विक्रम गुप्ता, वरिष्ठ विज्ञानी, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान