विश्व हेपेटाइटिस दिवस के मौके पर राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में वैज्ञानिक सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार में चिकित्सा विशेषज्ञों ने हेपेटाइटिस बी बीमारी से जुड़े तमाम पहलुओं पर चर्चा की। कम्युनिटी मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. देवव्रत राय ने कहा कि अधिक से अधिक जागरूकता कार्यक्रम चलाकर हेपेटाइटिस के संक्रमण को रोका जा सकता है।
कम्युनिटी मेडिसिन की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनुपमा आर्य ने कहा कि चिकित्सा विज्ञानियों द्वारा अब तक हैपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई की खोज की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि बीमारी पर नियंत्रण पाना है तो वायरस के स्रोत पर नियंत्रण पाना जरूरी है। बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से 2030 तक हेपेटाइटिस के संक्रमण को 90 से 95 फीसदी तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। डॉ. धीरज गुप्ता ने कहा हेपेटाइटिस वायरस के बचाव के लिए अभी तक कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। केवल जानकारी एवं सही समय पर जांच और उपचार के द्वारा ही इससे बचा जा सकता है।
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रिचा सिन्हा ने बताया कि मौजूदा हेपेटाइटिस संक्रमण में हेपेटाइटिस बी और सी सबसे अधिक घातक हैं। डॉ. प्रियंका डोभाल ने बताया कि हेपेटाइटिस वायरस के कारण लीवर सबसे अधिक प्रभावित होता है। हेपेटाइटिस से हर साल दुनिया में सात लाख से अधिक मरीज अपनी जान गंवा देते हैं। वैज्ञानिक सेमिनार में पीजीआई चंडीगढ़ के हेपेटोलाजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मधुमिता प्रेमकुमार, डॉ. मधुलिका सिसोदिया, डॉ. सोनम, डॉ. देव्यानी सेमवाल, डॉ. हितेश नौटियाल, डॉ. शालकी समेत कई चिकित्सकों ने व्याख्यान दिया।