इन्होंने न दिन देखा, न रात, न नौकरी जाने की चिंता की और न तनख्वाह कटने का डर इन पर हावी हुआ। कुछ नजर आया तो बस जज्बा। ये वह स्वयंसेवी थे, जिन्होंने उत्तराखंड में आई आपदा में कंधे-से-कंधा मिलाकर आपदाग्रस्तों, जरूरतमंदों की मदद की।
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जहां सरकारी मदद नहीं पहुंची, वहां यही स्वयंसेवी संस्थाएं नजर आईं। प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर जब आपदा प्रभावित क्षेत्रों के दौरे पर पहुंची तो यही नजारा उनके सामने भी था। सरकारी मदद नदारद थी, लेकिन स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता जुटे थे। ‘शासक’ जहां गुमशुदा था, वहां राज्य की सीमाओं से परे इन ‘राष्ट्रीय’ नागरिकों ने एक नई इबारत लिखी।
आर्ट आफ लिविंग के बंगलूरू आश्रम से स्वामी दिव्यानंद ने ऋषिकेश में आकर कैंप बना लिया। कितने टैंट भेजने हैं, कितने सोलर लैंप जाने हैं, कितने ड्राइ फूड पैकेट जाने हैं, इस सबका समन्वय यह उसी कैंप से कर रहे थे।
बिहार में कोसी में आई बाढ़ से पैदा आपदा में भी लोगों के काम आ चुके संस्था के कार्यकर्ता भारतेंदु हरियाणा से उत्तराखंड पहुंचे। नासिक से 10 स्वयंसेवियों की टीम आई। इसने गुप्तकाशी में कालीमठ से थोड़ा आगे कैंप किया। नदी पर बना पुल बह गया था। लोगों को मदद की जरूरत थी।
खुद के खाने के लिए भी नहीं बचा
सात की जगह यहां इस टीम को 17 दिन हो गए। खुद के खाने के लिए भी नहीं बचा, लेकिन टीम पीछे नहीं हटी। संस्था में आस्था रखने वाले आंध्र प्रदेश से सात स्वयंसेवी नितिन देसाई, महादेव और पी शवली, जबकि कर्नाटक से महबूब, इस्माइल, भास्कर और महेश मदद को पहुंचे।
इस पहलू को भी नजरअंदाज किया कि प्राइवेट नौकरियों में हैं, अगर ज्यादा समय लगा तो नौकरी से हाथ भी धोना पड़ सकता है। इसी तरह हैदराबाद से श्रीकांत और सतीश, जबकि बंगलूरू से रितेश भी पहुंचे। दोनों यहां साफ्टवेयर प्रोफेशनल हैं। लेकिन आपदा ग्रस्त लोगों की मदद को इन्होंने दिन-रात नहीं देखा।
टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की टीम उत्तराखंड पहुंची तो यहां के उत्तरकाशी-गंगोत्री हाइवे पर आपदा प्रभावित 200 गांवों का संबल बनी। टीम का नेतृत्व देश की पहली एवरेस्ट विजेता बछेंद्री पाल समेत एवरेस्ट विजेता प्रेमलता अग्रवाल कर रही थीं, जो इस फाउंडेशन की इंस्ट्रक्टर हैं। इस टीम ने पिंपला, जड़ाऊ, डिंडसारी गांवों को गोद भी लिया। यहां तक पहुंचने के लिए रास्ता तक नहीं बचा था।
ट्रेकिंग दल ने अपनी विशेषज्ञता का लाभ उठाते हुए लंबा ट्रेक किया। समय बेशक ज्यादा लगा, लेकिन लोगों तक पहुंच संभव हो सकी। फाउंडेशन की टीम इससे पहले भी उत्तराखंड की मदद को पहुंची थी, जब यह उत्तर प्रदेश का हिस्सा था और उत्तरकाशी जिला 1991 में आए भूकंप से दहल गया था। उस वक्त फाउंडेशन ने जिले के गणेशपुर गांव को गोद लेकर इसकी शक्ल बदल डाली।
कर्ज उतारने की संज्ञा
इस बार की आपदा में इस टीम ने न केवल फंसे हुए लोगों को निकालने का काम किया, बल्कि उन तक भोज्य सामग्री पहुंचाने में भी मदद की। बछेंद्री ने आपदा के वक्त राज्य की मदद को यहां का कर्ज उतारने की संज्ञा दी।
संत निरंकारी मिशन के 300 से अधिक स्वयंसेवी ने अगस्त्यमुनि, श्रीनगर, मयाली के आस-पास फंसे हुए लोगों को निकालने और उन तक भोजन सामग्री पहुंचाने में खुद को झोंक दिया। ऐसी जगहों पर भी वह पहुंचे, जहां प्रशासन की टीम नहीं पहुंच पाई।
दिन भर लगकर ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर ट्रैकिंग की, लेकिन जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाई। जहां एक तरफ लोग सरकारी कर्मचारियों की अकमर्णयता की गाथा सुना रहे थे, वहीं मिशन से जुड़े सरकारी कर्मचारी पीएस चौधरी अपने जैसे ही नौकरी से छुट्टी लेकर आपदा ग्रस्तों की मदद को आए लोगों का नेतृत्व कर रहे थे। 10 दिन उन्होंने जरूरतमंदों तक चादर, तिरपाल, सोलर लैंप पहुंचाने में बिताए।
याद नहीं की कितना चले
इन्हें खुद याद नहीं कि इसके लिए इन्हें कितने किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। यह तो बस मदद की जरूरत को देखते हुए सुबह से शाम तक घर-घर पहुंचते रहे। जोनल इंचार्ज संत हरभजन सिंह के निर्देशन में सातों शाखाओं से जुड़े कार्यकर्ताओं ने राहत सामग्री बांटने का काम किया। लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक परिवारों को पुनर्वास के लिए मिशन की तरफ से वित्तीय मदद भी मुहैया कराई गई।
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