हरिद्वार शक्तिपीठ माया देवी मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
ये है मान्यता
राजा दक्ष की पुत्री माता सती जब भगवान शिव के मना करने पर भी अपने पिता के यज्ञ में भाग लेने पहुंच गईं, तब वहां उपस्थित ऋषि-मुनियों और देवों ने उन्हें अपमानित किया। राजा दक्ष ने जहां छोटे-छोटे देवताओं, यक्ष, गंधर्वों का भाग यज्ञ स्थल पर रखा था, वहीं भगवान शंकर का न कोई भाग था और न कोई आसन बिछाया गया था। यह देख माता सती बहुत दुखी हुईं। पिता ने उनकी इतनी उपेक्षा की कि उन्होंने अपमान की अग्नि में प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। कालांतर में शिव सती की देह को कंधे पर उठाए पूरे लोक में घूमते रहे। इस दौरान भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र चला दिया। जिससे माता सती की देह के टुकड़े-टुकड़े हो गए। जिस स्थल पर सती की देह रखी गई थी, वहां नाभि गिरी, वही स्थल माया देवी के नाम से विख्यात है।
हरिद्वार शक्तिपीठ माया देवी
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भगवती की 52 शक्तिपीठों में से एक
माया देवी भगवती की 52 शक्तिपीठों में से एक है। चूंकि हरिद्वार में भगवती की नाभि गिरी थी, अत: इस स्थल को ब्रह्मांड का केंद्र भी माना जाता है। माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण डाकिनी, शाकिनी, पिशाचिनी आदि अला बलाओं से तीर्थ की रक्षा करती हैं। कहा जाता है कि यहां दर्शन करे बिना तीर्थों की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती।
हरिद्वार शक्तिपीठ माया देवी मंदिर
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हरिद्वार शक्तिपीठ माया देवी मंदिर
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ऐसे पहुंचे मंदिर तक
यह मंदिर हरिद्वार रेलवे और रोडवेज स्टेशन से मात्र दो किमी की दूरी पर नगर कोतवाली के निकट है। मंदिर जूना अखाड़ा परिसर में स्थापित है। आटो-ई-रिक्शा, निजी वाहन से आसानी से मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।