यहां गिरी थीं अमृत की बूंदें
मनसा का शाब्दिक अर्थ है ‘इच्छा पूर्ण करने वाली’। मान्यता है कि मंदिर का निर्माण वर्ष 1811 से 1815 के बीच हुआ है। राजा गोला सिंह ने इसका निर्माण कराया। मान्यता है कि मंदिर उन चार स्थानों में से एक है, जहां समुद्र मंथन के बाद निकली अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं। बाद में इस स्थान पर माता के मंदिर का निर्माण किया गया था। मंदिर का उल्लेख स्कंदपुराण में है। मनसा देवी को 10वीं देवी माना गया है।
मान्यता है कि एक बार जब महिषासुर नाम के राक्षस ने देवताओं को पराजित कर दिया। तब देवताओं ने देवी का स्मरण किया और देवी ने प्रकट होकर महिषासुर का वध कर दिया। मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी बताते हैं, देवी ने हरिद्वार के शिवालिक मालाओं के मुख्य शिखर के पास विश्राम किया और इसीलिए यहां मनसा देवी मंदिर की स्थापना हुई। कालांतर में यहां मंदिर बना और मां मनसा देवी की मूर्ति स्थापित की गई।
ऐसे पहुंचा जा सकता है मंदिर
हरिद्वार अपर रोड से मां मनसा देवी मंदिर का रास्ता है। अपर रोड से पैदल करीब दो किमी का रास्ता है। साथ ही यहां रोप-वे की सुविधा भी है। हरिद्वार रेलवे और रोडवेज स्टेशन से रिक्शा, तांगा, आटो, ई-रिक्शा से आसानी से अपर रोड तक पहुंचा जा सकता है।