जंगलों में जाकर धर्म ध्वजा को न्योता देना और वन देवता की अनुमति से उसे अखाड़ों में लाना कुंभ का बड़ा आयोजन है। प्रत्येक कुंभ में साधु संन्यासी अखाड़ों में धर्म ध्वजाओं की स्थापना समारोह पूर्वक करते हैं। धर्म ध्वजा स्थापना के बाद दशनाम अखाड़ों में कुंभ के आयोजन प्रारंभ हो जाते हैं।
नागाओं, बैरागियों, उदासियों और निर्मलों के कुल 13 अखाड़े हैं। उनका जुड़ाव देश के हजारों मठों और आश्रमों से है। जब भी कुंभ मेले का आयोजन किसी भी कुंभ नगर में होता है, तब संतों की पेशवाई के बाद धर्म ध्वजा की स्थापना होती है।
उससे पहले अखाड़े अपने-अपने मुहूर्त निकालकर वन देवता से धर्म ध्वजा देने की मांग करने जंगल जाते हैं। इसके लिए पहले समय में विधिवत समारोह होता था। आज भी यह रस्म अदायगी की जाती है। एक मुहूर्त में साधु संत वनों में जाकर ऊंची धर्म ध्वजा के लिए पेड़ का चयन करते हैं।
इस पेड़ पर अखाड़ा निशानदेही कर देता है। बाद में एक और मुहूर्त में उस वन से पेड़ को काटा जाता है। काटने से पहले साधु बाबा बाकायदा पूजा कर पेड़ से उसे काटने की अनुमति लेते हैं।
बाबा गोपालानंद बताते हैं कि उस जमाने में कई बार साधु संतों को आभास हो जाता था कि जिस पेड़ को विशाल ध्वजा के लिए लेने आए हैं, वह पेड़ वन छोड़कर उनके साथ जाने को तैयार नहीं।
तब उस पेड़ की जगह किसी और पेड़ का चयन किया जाता था। अखाड़ों में धर्म ध्वजा स्थापना के दिन भव्य आयोजन होते हैं। इस बार यह आयोजन फरवरी के अंतिम सप्ताह या मार्च में होने वाले स्नान से पहले होगा।