फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

CM के खिलाफ आक्रमक रहने वाले हरक की चुप्पी पर सस्पेंस

Tue, 20 Dec 2016 10:12 AM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
हरक सिंह रावत - फोटो : AmarUjala
विज्ञापन
कांग्रेस के खिलाफ बगावत कर हरीश रावत की सत्ता को चुनौती देने वाले हरक सिंह रावत कुछ समय से सियासी फ्रंट पर नहीं दिख रह हैं। 18 मार्च के बाद उनके सरकार पर तीखे जुबानी हमले अब कहीं नहीं सुनाई दे रहे। भाजपा में आने के बाद चुनाव नहीं लड़ने के बड़े बयान के बाद उनका लो प्रोफाइल होना सियासी कौतूहल का विषय बना हुआ है।
विज्ञापन


लाइमलाइट में रहने वाले हरक सिंह का परिवर्तन यात्रा के दौरान प्रदेश लीडरशिप के साथ पोस्टर पर चेहरा नहीं होने से उनकी मायूसी बढ़ी होने की चर्चा है। इतना ही नहीं उन्हें और उनके करीबियों के विधानसभा टिकटों पर बना सस्पेंस भी उनकी खामोशी का एक कारण हो सकता है।

हरक सिंह रावत की सियासी पृष्ठभूमि दबंग नेता की रही है। भाजपा, बसपा कांग्रेस और फिर भाजपा का सफर तय कर चुके हरक हमेशा तीखे तेवरों के लिए जाने जाते रहे हैं। धारी देवी की कसम लेकर आला कमान को जूते की नोक जैसे बयान सियासी हलकों में चर्चा का विषय रहे।
विज्ञापन


18 मार्च 2016 में भी सदन में हरक सिंह की अगुवाई में नौ कांग्रेस के विधायकों ने भाजपा को समर्थन दिया। उनके रोकने वाले सरकार के मंत्री विधायकों को उनका गुस्सा झेलना पड़ा। सीएम और विधायक मदन बिष्ट के विधायकों की खरीद फरोख्त वाले स्टिंग के सूत्रधार भी वही माने जाते हैं। अपनी इस दबंग छवि को भाजपा में आने के बाद भी उन्होंने बरकार रखा। पर्दाफाश रैली तक उनके यह तेवर दिखे, लेकिन उसके बाद से हरक अब बैकफुट पर दिख रहे हैं।

यात्रा को लेकर दिल्ली से प्रचार सामग्री में जिन चेहरों को रखा गया उसमें सभी पूर्व सीएम और सांसदों के अलावा सतपाल महाराज को जगह मिली, लेकिन हरक नहीं थे। प्रदेश में टॉप भाजपा लीडरशिप में भले उनको स्थान नहीं मिला। प्रदेश कोर ग्रुप में स्थान से उन्हें सब्र करना पड़ा। परिवर्तन यात्रा के दौरान उनके दौरे भी खास चर्चा बंटोरते नहीं दिखे।

रक्षा मंत्री मनोहर परिकर की जनसभा में जरूर उन्होंने हरीश रावत पर हमला बोला, लेकिन सियासी जनसभाओं से इतर भी मुद्दों पर आक्रामक तेवरों से अपनी छाप छोड़ने वाले हरक अब शांत दिख रहे हैं। इसके अलावा जानकारों की माने तो अपने लिए विधानसभा क्षेत्र के साथ पत्नी के लिए भी सीट पर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिलने की वजह से वे कुछ सदमे की स्थिति में हैं। उनके श्रीनगर, कभी यमकेश्वर, कभी कोटद्वार, कभी लैंसडाउन तो कभी सहसपुर से चुनाव लड़ने की अटकलें लगतीं हैं, मगर अभी तक स्थिति अस्पष्ट है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें