लोकतंत्र में भले ही सभी ‘जन’ एक होने की बात कही जाती हो। पर हजारों लोग ऐसे हैं, जिन्हें कुदरत और ‘तंत्र’ ने दूसरे ‘ग्रह’ का निवासी बना दिया है।
ये कोई और नहीं खत्ता और गोठ वाले हैं। इस समय जब जनता जनार्दन हो चुकी है, ऐसे में खत्ते वालों की उम्मीद, सपने और परेशानी क्या है, जानने को अमर उजाला टीम नैनीताल जिले के हंसपुर खत्ता पहुंची।
तब खत्ते वालों ने बताया कि सांसद तो दूर, उन्होंने डीएम तक नहीं देखा। यहां तो वोट मांगने नेताओं के ‘चेले’ आते हैं।
माओवाद की ट्रेनिंग के लिए चर्चा में रहा खत्ता
हल्द्वानी वन प्रभाग जौलासाल रेंज के जंगल में हंसपुर खत्ता बसा है। यह हल्द्वानी से करीब 60 किमी दूर है।
यह वही खत्ता है, जो माओवाद के ट्रेनिंग के लिए चर्चा में रहा। माओवाद के नाम पर पुलिस चौकी तो खुल गई, लेकिन यहां के लोगों की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया।
यह जगह साल में करीब चार महीने दुनिया से कट जाता है। यहां तक पहुंचने के लिए पांच नदियां नंधौर, कैलास, चुगाड़, हाथगाड़ और रेना हैं। कई छोटे नाले भी अलग से।
अगर यह पार भी हो गए, तो बाघ, तेंदुआ दूसरे जानवर कब हमला कर दें कोई भरोसा नहीं। इनके बीच करीब 100 परिवार बसे हैं। खत्ते वाले सात मई को करीब 12 किलोमीटर चलकर चोरगलिया में वोट देने जाएंगे।
सौ साल से भी पुराना है खत्ता
गांव वालों का दावा है कि यह सौ साल से भी पुराना खत्ता है। करीब एक हजार लोग जहां पर रहते हैं, वहां पर तकनीकी कारणों से सुविधा नहीं पहुंच सकी है।
इलाज कराना है, तो नानकमत्ता या फिर हल्द्वानी जाना पड़ता है। पढ़ाई के लिए दो प्राथमिक और एक जूनियर हाईस्कूल है। पर एक स्कूल में केवल एक टीचर है।
बिजली है नहीं। पानी के लिए हैंडपंप लगाया है। बस इतनी सुविधा ही सौ साल में पहुंची। खत्ते वाले से पूछा- क्या कभी सांसद देखा है? कोई जिलाधिकारी, एसडीएम, कृषि अधिकारी पहुंचा है? तो उन्होंने इंकार कर किया।
कोई उम्मीद है सांसद और चुनाव से, तो पान सिंह कहते है कि नदियों में पार करने की स्थाई व्यवस्था और बच्चों के लिए अच्छी पढ़ाई का इंतजाम चाहते हैं।
वायदा किया लेकिन काम कुछ भी नहीं हुआ
चुनाव को लेकर नेताओं और पार्टियों के रुख पर लोग तंज भी कसते हैं। कहते हैं कि केवल सांसद के चेले ही वोट मांगने आते हैं।
विधायक आए थे, वायदा किया लेकिन काम कुछ भी नहीं हुआ। गंगा सिंह और कमल सिंह बोरा कहते हैं कि अब खेती से पेट नहीं पल रहा है। हमारे बच्चे भी पढ़कर जंगल की मुश्किलों से निकलना चाहते हैं।
जीवंती देवी कहती हैं कि फसल को हाथी, नील गाय, सूअर चट कर जाते हैं। हयातराम कहते हैं कि यहां बसे हुए सौ साल हो चुके हैं, पर कोई भी अधिकार नहीं मिला, जबकि वनाधिकार अधिनियम तक लागू हो चुका है।
माओवाद के चक्कर में काटने पड़े कोर्ट के चक्कर
खेती में नुकसान को देखते हुए लोग सिडकुल की तरफ जाने लगे हैं। करीब 18 साल का दीवान सिंह मेहरा कहते हैं कि उनके समेत तीन लोग सिडकुल में काम कर रहे हैं। चार से पांच हजार रुपए मिल जाते हैं।
हंसपुर खत्ता में माओवाद के बारे में पूछने पर लोगों में तल्खी और सरकारी व्यवस्था का भय नजर आता है।
बताते हैं कि कुछ लोग पढ़ाने के नाम पर आए थे। बाद में सरकारी मुलाजिमों ने बताया कि वे माओवादी थे। कई साल तक कुछ लोगों इसके चक्कर में पुलिस, कोर्ट के चक्कर काटते रहे।
अब डर के चलते कोई भी बाहरी व्यक्ति आता है, तो पहले उसका खुद ही खत्ते वाले पूरी पड़ताल करते हैं।
पर खत्ते वाले मानते हैं कि किसान महासभा और माले वाले ही उनकी सुध लेते हैं। महीने में एक बार आते हैं, हमारी समस्या सुनते और सरकारी तंत्र से जूझते हैं। बाकी लोग तो केवल वादे ही करते हैं।