हैस्को की ओर से प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से संबंधित तकनीक का निरीक्षण करने के बाद प्रमुख सचिव वन ने कहा कि हैस्को को पर्यावरण के रूप में काम करने वाले प्रशिक्षण संस्थान के रूप में देखा जा सकता है। हैस्को ने संस्थान के बगल में सूख रही नदी में पानी की वापसी कराई।
डॉ. अनिल जोशी ने बताया कि हैस्को की ओर से चिता के अवशेषों को मिट्टी में मिलाकर पौधा लगाने की स्मृति वन की परिकल्पना को भी प्रमुख सचिव ने पसंद किया। प्रमुख सचिव को फल प्रसंस्करण, ऊर्जा, घराट से बिजली, पानी को साफ करने, स्टीम कुकर और स्टोव, किसान बैंक आदि की जानकारी भी दी गई।
पानी, मिट्टी, हवा आदि में सुधार का आकलन है जीईपी
डॉ. अनिल जोशी के मुताबिक सकल घरेलू उत्पाद की तर्ज पर ही जीईपी (ग्रॉस एन्वायरमेंट प्रोडेक्ट) तैयार की जा सकती है। जीईपी से मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पर्यावरण की किस कीमत पर अर्थव्यवस्था का विकास हो रहा है। यह देखा जाए कि पानी, मिट्टी, हवा, जंगल, जैव विविधता, लोगों के रहन सहन में कितना सुधार हो रहा है। इस सुधार के आकलन को ही जीईपी कहा जा सकता है।
2013 में भी हुई थी कोशिश
केदारनाथ आपदा के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार ने भी प्रदेश में जीईपी लागू करने का इरादा जताया था। इसके लिए नोबेल पुरस्कार विजेता सुरेश पचौरी की अध्यक्षता में कमेटी का गठन भी किया था। इसके बाद यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया।