फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ट्रेनिंग देने आए थे, देने लगे भाषण

Mon, 10 Aug 2015 03:23 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
विज्ञापन
पिछले दिनों देहरादून में भाजपा का प्रशिक्षण शिविर था, उद्देश्य था कि नए सदस्यों को पार्टी की विचारधारा से अवगत कराया जाए ताकि वे लंबे समय तक पार्टी से जुड़े रहे। लेकिन जैसे ही वरिष्ठ नेताओं ने माइक थामा तो प्रशिक्षण शिविर जनसभा में बदल गया।
विज्ञापन


एक पुराने दिग्गज ने माइक संभाला और बोले कि हमारा दामन बेदाग है, आज तक ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे हमें सीना चौड़ा करके चलने में दिक्कत हो। हिम्मत है तो एक भी आदमी हम पर किसी तरह का आरोप साबित करे।

नए सदस्य भी सुनकर हैरान थे। तभी दूसरे दिग्गज की बारी आई। माइक संभालते ही एक ऐसे नेता को निशाने पर ले लिया जो कि पिछले साल कांग्रेस से भाजपा में आए थे। नेताजी बोले, सफेद लंबी टोपी पहने से पार्टी मजबूत नहीं होती। लंबी टोपी वाले नेताजी बस सुनते ही रहे।
विज्ञापन


एक और पुराने प्रदेश अध्यक्ष खडे़ हुए, बोलने लगे तो उनकी निगाह भी कांग्रेस से आए इस हैवीवेट नेता पर टिकी रही। नजर नहीं हटी तो शहर के प्रथम नागरिक ने एक कार्यकर्ता के हाथों पर्ची भिजवाई और कहा, कम से कम नजर तो हटा लो उसके चेहरे से।

तबादला संक्रमण का इलाज
एक महकमे में इन दिनों तबादला सीजन के संक्रमण से पीड़ितों ने नेता जी का जीना हराम कर रखा है। नेता जी ने तबादलों के नाम से बीमार होने वालों की नब्ज टटोलने का जिम्मा अपने एक प्यादे को दे रखा है। नाड़ी देख रोग पहचाने में प्यादा माहिर है।

किसे कौन सी बीमारी का मेडिकल प्रमाण पत्र तैयार करना है यह तक बता देता है। अपनी मनचाही तैनाती के लिए बीमार लाइन में हैं। तैनाती की समय अवधि बढ़ा कर राहत देने और अटैचमेंट जैसे इलाज भी उसके पास है। हां, फीस थोड़ी महंगी है। जेब ढीली नहीं कर सकते तो इलाज की कोई गांरटी नहीं।

नेता जी का इतना रसूख है कि अपने चहेते मरीजों के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि तबादलों के नाम से बीमार पड़े रोगियों के इलाज में प्यादे के अलावा किसी का भरोसा भी नहीं करते।

आखिर सबकी सेहत का ख्याल जो रखते हैं। सुना है कि नेता जी शासन तक की नहीं सुनते। आखिर सुने भी क्यों? तबादलों का संक्रमण साल में एक बार होता है ऐसे में कोई कोताही हो गई तो सबकी सेहत खराब हो जाएगी।

ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया
ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया। फिलहाल प्रदेश के सत्ताधारी दल को इसी तरह के एक मर्ज से दो चार होना पड़ रहा है। संगठन के मुखिया लगातार पार्टी नेताओं को समझा रहे हैं कि आने वाले दिनों में मिठाई खाने की कोशिश में हो तो आज काम करो।

पर यह ’काम ‘ ही सारी बीमारी की जड़ भी है। पार्टी में सालों से घिसपिट रहे नेताओं की शिकायत है कि ओहदा तो मिल नहीं रहा। काम करने के लिए ओहदा भी तो होना चाहिए। मुखिया ने इनकी बात मान ली तो नया झंझट खड़ा हो गया।

अब शिकायत उभर कर सामने आई है कि इनको ज्यादा बड़ा काम दे दिया और हमको नहीं दिया। इस शिकायत से परेशान हाकिम ने अब इस बंटवारे पर ही लगाम लगाने का फैसला कर लिया है। उनका कहना है कि मर्ज ऐसा है जिसका इलाज करना ही बेकार है। इलाज करने के फेर में पड़े तो मर्ज ही लाइलाज हो जाएगा।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें