संगठन या दल बनाने के लिए समान धर्म, गुण, क्षेत्र आदि की खोज होती ही रहती है। खासकर तब जब संघ में शक्ति का भाव हो।
राजनीति इस नियम का खुलकर उपयोग करती भी है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए कहीं क्षेत्र की समानता का आधार लिया जा रहा है तो कहीं जाती है। कुमाऊं विकास समिति, गढ़वाल विकास समितियों की प्रदेश में पिछले कुछ समय से बाढ़ भी आई हुई है।
पर प्रदेश में एक राजनेता के बेटे ने नई पहल की। उन्होंने नेता पुत्रों का ही मंच बना डाला। अभी यह स्पष्ट नही है कि नेता पुत्र को नेता पुत्र मंच बनाने में कितनी सफलता मिली पर वह शुरुआत कर चुके हैं। मंच बनाने के पीछे उनका तर्क है कि पिता राजनेताओं केरसूख का इस्तेमाल नेता पुत्र बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
तर्क में दम भी है। यह इशारा इससे तो मिल ही रहा है कि राजनीतिक विरासत में भी अब बंटने लगी है। पर उनके इस तर्क को अगर नेता पत्नियां, बेटियां, नेता भाई, नेता पिता, नेता मां, नेता भतीजे आदि भी उधार में ले लें तो...? इस सवाल के जवाब में नेता पुत्र को इतना तो बताना ही चाहिए कि बाकी के मंच उन्हें पसंद आएंगे क्या?