राजनीति का चस्का भी अफीम के नशे से कम नहीं है। जनता की राजनीति हो या फिर कर्मचारियों की सियासत, दोनों का अपना मजा है।
नौकरी से रिटायर होने के बाद भी कर्मचारियों का राजनीति से मोह नहीं छूटता है। राज्य के बहुत बड़े कर्मचारी संगठन के एक बड़े पदाधिकारी दो महीने पहले रिटायर हो गए, लेकिन अभी भी वह खुद को जिम्मेदार पदाधिकारी की तरह पेश करते हैं। पिछले दिनों शासन के साथ हुई बैठक में भी ये महाशय शामिल हुए तो कई पदाधिकारियों व अफसरों को यह बात खल गई।
एक अधिकारी ने कहा भी कि वैसे तो कर्मचारी संगठन न्याय की लड़ाई लड़ने का दंभ भरते हैं, लेकिन खुद क्या करते हैं, उस पर नजर कौन डाले। वैसे ये जनाब काफी घाग टाइप के नेता हैं। रिटायर होने से पहले ही इन्होंने अपने विस्तार की भरसक कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।
इसके बाद शासन में बैठे एक सचिव की मदद से खास वर्ग के कर्मियों का ग्रेड पे बढ़वाने के लिए फाइल चला दी, वो तो भला हो वित्त विभाग के मुखिया का, ना केवल फाइल बंद हुई बल्कि अच्छी खासी फटकार भी लगी