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गूगल पर छाए परदादा, लेकिन घर चलाने के लिए पोता चला रहा टैक्सी

Tue, 24 Oct 2017 03:18 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून 
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पर्वतारोहण संस्थान में नौकरी की चाह
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अपने जन्म दिन पर परदादा गूगल पर छाए रहे, लेकिन परपोता टैक्सी चला कर अपने परिवार को पाल रहा है। 21 अक्टूबर को पं. नैन सिंह रावत के जन्म दिन पर गूगल ने उनका डूडल बनाकर श्रद्धांजलि दी।
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परिवार को पालने के लिए कवींद्र रावत अपने परदादा के नाम पर खोले गए पर्वतारोहण संस्थान में बस एक नौकरी की चाह रखते हैं। कवींद्र रावत उनके एकमात्र वंशज हैं।

सर्वे आफ इंडिया ने दस अप्रैल 1802 को ग्रेट ट्रिगोनोमैट्रिकल सर्वे (जीटीएस) की शुरुआत की थी। इस सर्वे का उद्देश्य भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा मध्य एशिया और महान हिमालय का मानचित्र तैयार करना था। पंडित नैनसिंह की जीवनी में उल्लेख है कि वह 1863 तक मिलम के स्कूल में शिक्षक रहे। तभी से उनको पंडित कहकर संबोधित किया जाने लगा। पंडित नैन सिंह और उनके भाई किशन सिंह 1863 में जीटीएस से जुड़े और नैन सिंह 1875 तक तिब्बत की खोज में लगे रहे।  
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जीटीएस के अंतर्गत पंडित नैन सिंह ने काठमांडू से लेकर ल्हासा और मानसरोवर झील का नक्शा तैयार किया। इसके बाद वह सतलुज और सिंध नदी के उद्गम स्थलों तक गए। उन्होंने 1870 में काशगर मिशन और 1874 लेह मिशन पर काम किया। पंडित नैन सिंह को लेह से ल्हासा तक तिब्बत के उत्तरी भाग का मानचित्र तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी।
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बस एक अदद नौकरी की आस

nain singh rawat
पिथौरागढ़ जिले के एक छोटे से कस्बे मदकोट में रहने वाले कवींद्र रावत इस समय टैक्सी चलाकर अपना घर चला रहे हैं। अपने परदादा की जयंती पर गूगल पर मिले सम्मान से वह बेहद खुश हैं।

कवींद्र बताते हैं कि उसके परदादा के नाम पर मुनस्यारी में पर्वतारोहण संस्थान खुला है। उस संस्थान में उन्होंने अपने परदादा का हवाला देते हुए छोटी-मोटी नौकरी के लिए आवेदन किया था, लेकिन दो साल बाद भी कोई जवाब नहीं मिला। अब उन्हें आस बंधी है कि इस संस्थान में नौकरी मिल जाएगी तो दो वक्त की रोजी-रोटी का बंदोबस्त हो जाएगा।

नैन सिंह का सबसे कठिन दौरा 15 जुलाई 1874 को लेह से शुरू हुआ था, जो उनकी आखिरी खोज यात्रा भी साबित हुई। इसमें वह लद्दाख के लेह से होते हुए ल्हासा और फिर असम के तवांग पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई। जो बाद में बहुत उपयोगी साबित हुई। उन्हें ल्हासा से बीजिंग तक जाना था, लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ। पंडित ने लेह से लेकर उदयगिरी तक 1405 मील की यात्रा की थी। द जियोग्राफिकल मैगजीन में 1876 में पहली बार उनके कार्यों पर लेख प्रकाशित हुआ था।
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