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गूगल ने बनाया देवभूमि के लाल का 'डूडल', जिसका कारनामा सुनकर आप होंगे हैरान

Sat, 21 Oct 2017 06:15 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
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doodle of nain singh rawat - फोटो : google
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शनिवार को देवभूमि के लाल का 'डूडल' बनाकर गूगल ने उसे श्रद्धाजं‍लि दी। उत्तराखंड के इस बेटे का कारनामा सुनकर आप हैरान रह जाएंगे।
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पिथौरागढ़ निवासी नैन सिंह को गूगल 'डूडल' बनाकर उन्‍हें श्रद्धाजं‍लि दे रहा है। इतना ही नहीं भारतीय डाक विभाग ने भी उनकी उपलब्धि के 139 साल बाद 27 जून 2004 को उन पर डाक टिकट निकाला था। आइए जानते हैं उनके बारे रोचक तथ्य...

भारत चीन सीमा पर स्थित मुनस्यारी तहसील के अंतिम गांव मिलम निवासी पं. नैन सिंह का जन्म 21 अक्टूबर 1830 को हुआ था। इनके पिता का नाम अमर सिंह मिलव्वाल था।
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पूरे तिब्बत का नक्शा तैयार करने का श्रेय नैन सिंह को

nain singh rawat
नैन सिंह रावत की शिक्षा प्राथमिक स्तर तक ही हुई थी। बाद में इसी विद्यालय में वह शिक्षक बन गए। शिक्षक बनने पर लोग उन्हें पंडित के नाम से बुलाने लगे। वहीं रॉयल ज्योग्रेफिकल सोसायटी एवं सर्वे ऑफ इंडिया के लिए पं. नैन सिंह रावत 'भीष्म पितामह' के रूप में जाने जाते हैं। 

नैन सिंह रावत को बिना किसी आधुनिक उपकरण के पूरे तिब्बत का नक्शा तैयार करने का श्रेय दिया है। कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के लोग भी उनका नाम पूरे सम्मान के साथ लेते थे।

उस समय तिबब्त में किसी विदेशी शख्स के जाने पर सख्त मनाही थी। अगर कोई चोरी छिपे तिब्बत पहुंच भी जाए तो पकड़े जाने पर उसे मौत तक की सजा दी सकती थी।

 
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तिब्बत का नक्शा बनाने में उन्हें परेशानी आ रही थी

Doodle o​f Nain Singh Rawat
ऐसे में नैन सिंह रावत अपने भाई के साथ रस्सी, थर्मामीटर और कंपास लेकर पूरा तिब्बत नाप आए। दरअसल 19वीं शताब्दी में अंग्रेज भारत का नक्शा तैयार कर रहे थे लेकिन तिब्बत का नक्शा बनाने में उन्हें परेशानी आ रही थी। तब उन्होंने किसी भारतीय नागरिक को ही वहां भेजने की योजना बनाई। जिसपर साल 1863 में अंग्रेज सरकार को दो ऐसे लोग मिल गए जो तिब्बत जान के लिए तैयार हो गए।

गुप्त रूप से होने वाले सर्वे के लिए नैन सिंह रावत ने तिब्बती लामा का वेश धारण किया और अपने कदमों की संख्या गिनते हुए वर्ष 1865 में नाप जोख का कार्य प्रारंभ किया।

लामा के रूप में सर्वे करते हुए कई बार उन्हें भूखा प्यासा भी रहना पड़ा। चने चबाकर उन्होंने कई दिन बिताए। सर्वे के दौरान वह क्षेत्र के लोगों के रहन-सहन, रीति रिवाज और आर्थिक स्थिति की भी जानकारी लेते रहते थे। इन जानकारियों को अपनी डायरी में नोट करते थे। इसका वर्णन का सारांश कर्नल मांटोगोमरी द्वारा रॉयल ज्योग्रेफिकल सोसायटी द्वारा प्रकाशित जनरल के 38वें खंड में किया गया है।
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