ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय क्षेत्र में हो रहे पर्यावरणीय परिवर्तन का अध्ययन करने के लिए भारतीय हिमालय क्षेत्र में पहली बार दो ग्लोरिआ (ग्लोबल रिसर्च इनिसिएटिव इन एल्पाइन) साइट स्थापित कर दी गई हैं।
ये साइट पिथौरागढ़ जिले के व्यास और चौंदास वैली के बुग्यालों में स्थापित की गई हैं। इसके साथ ही भारत क्लाइमेट चेंज के अध्ययन के लिए ग्लोरिआ साइट स्थापित करने वाले दुनिया के 42 देशों की सूची में शामिल हो गया है। इन स्थानों पर उच्च तकनीक वाले भूमिगत उपकरण लगाए गए हैं जो इस भू भाग में होने वाले परिवर्तनों के बारे में जानकारी देंगे। यहां प्राप्त होने वाले डाटा का विश्व स्तर पर आकलन किया जाएगा।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती पर कई तरह से असर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय क्षेत्र में भी कई तरह के पर्यावरणीय परिवर्तन हो रहे हैं, लेकिन अभी तक इस बारे में सटीक भविष्यवाणी करना संभव नहीं हो पा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से हिमालय क्षेत्र में हो रहे क्लाइमेट चेंज के अध्ययन के लिए भारत से पहले विश्व के 41 देशों में 124 ग्लोरिआ (ग्लोबल रिसर्च इनिसिएटिव इन एल्पाइन) साइट स्थापित की गई हैं।
हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अधीन जीबी पंत हिमालय पर्यावरण विकास संस्थान कोसी कटारमल (अल्मोड़ा) के वैज्ञानिकों ने भारतीय हिमालय में भी व्यास और चौदांस घाटी के बुग्यालों में दो ग्लोरिआ साइट स्थापित कर दी हैं। अब भारत हिमालय में ग्लोरिआ साइट स्थापित करने वाला 42वां देश बन गया है और अब विश्व भर में ग्लोरिआ साइटों की संख्या 126 हो चुकी है।
जीबी पंत हिमालय पर्यावरण विकास संस्थान के वैज्ञानिक डा.आरएस रावल ने बताया कि व्यास और चौंदास घाटी के बुग्यालों पर स्थापित की गई ग्लोरिआ साइट्स में भूमि के भीतर उच्च तकनीक के उपकरण लगाए गए हैं।
वैज्ञानिक इन उपकरणों के जरिये इस क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों पर नजर रखेंगे। हर पांच साल में इस बारे रिपोर्ट तैयार करके इसका विश्व स्तर पर आकलन किया जाएगा। इस तरह के अध्ययन के बाद वैज्ञानिक आने वाले 20-30 सालों में ग्लोबल वार्मिंग से पड़ने वाले प्रभावों के बारे में भविष्यवाणी भी कर सकेंगे।