शासन को दे दी गई सूचना
जिलाधिकारी मयूर दीक्षित ने बताया कि ग्लेशियर टूटने की घटना के बारे में शासन को सूचित कर दिया गया है। साथ ही वाडिया संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों से भी चर्चा की गई है। शासन स्तर से जल्द विशेेषज्ञों की एक टीम चोराबाड़ी क्षेत्र का भ्रमण कर वहां के हालातों का जायजा लेगी। संवाद
क्षेत्र की नियमित निगरानी जरूरी
जून 2013 की केदारनाथ आपदा का कारण बने चोराबाड़ी ताल से आने वाले 25 से 30 वर्षों या उससे भी अधिक समय तक कोई खतरा नहीं है। वाडिया संस्थान के पूर्व वरिष्ठ ग्लेशियर विशेषज्ञ और आपदा के बाद केदारनाथ से लेकर चोराबाड़ी ताल क्षेत्र का गहन अध्ययन करने वाले डा. डीपी डोभाल बताते हैं कि केदारघाटी रामबाड़ा से आगे यू आकार में है, जो बहुत लंबा है।
चोराबाड़ी ताल जब बना, तब उसकी गहराई सिर्फ आठ मीटर और चौड़ाई तीन सौ मीटर थी लेकिन वर्ष 2013 में ग्लेशियर टूटने के बाद इसकी गहराई 25 मीटर तक हो गई है और मुहाना पूरी तरह से टूट गया जिससे मलबा भी बह चुका है। इस क्षेत्र की नियमित निगरानी बहुत जरूरी है। चोराबाड़ी ग्लेशियर सात किमी लंबा है और दूसरा कंपेनियन ग्लेशियर तीन किमी लंबा है।