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गिर्दा नहीं, लेकिन उनकी आवाज गूंज उठी...

Fri, 23 Aug 2013 12:00 AM IST
अमर उजाला, प्रवेश कुमारी, देहरादून
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गिर्दा नहीं थे, लेकिन उनकी आवाज गूंज रही थी। ‘जब तख्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे...’ गीत के साथ गिर्दा का एक-एक अंदाज स्लाइड पर था और नमी लोगों की आंखों में।
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फिल्म अजीम प्रेम जी फाउंडेशन ने बनाई थी। नगर निगम सभागार में बृहस्पतिवार को गिरीश चंद्र तिवारी गिर्दा की पुण्य तिथि पर और ‘पहाड़ का गिर्दा, गिर्दा का पहाड़’ कार्यक्रम हुआ। गिर्दा का जिक्र हुआ तो चर्चा राज्य की वर्तमान दशा-दिशा पर भी हुई।

गिर्दा के जनगीतों
गिर्दा के जनगीतों, कविताओं पर बात हुई तो राज्य में भू माफिया, कमीशनखोरों, सत्ता लोलुपों के बढ़ते हौसलों पर भी। हाल ही में आई केदारनाथ प्रलय को लेकर हालात निराशाजनक बताने वाले बहुत थे, लेकिन ‘जैंता एक दिन तो आलो ऊ दिन यो दुनी मा’ गीत डा. अतुल शर्मा ने मंच से पेश किया तो इसमें कलाकारों की टोली के साथ ही शामिल हर आवाज के जरिए यह बताने के लिए काफी थी कि गिर्दा एक विचार थे और विचार कभी मरते नहीं।
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संघर्ष जारी रहेगा हक मिल जाने तक। कार्यक्रम में इतिहासकार शेखर पाठक, आंदोलनकारी कमला पंत, इंद्रेश मैखुरी, मालती हालदार, सुनील कैंथोला, बृजमोहन शर्मा, प्रवीण भट्ट, गीता गैरोला, समीर रतूड़ी समेत गिर्दा के तमाम साथी मौजूद रहे।

मंचन से दिखाया पहले विनाश, फिर राहत
विकास के नाम पर पहले विनाश को दावत और उसके बाद सड़ी राहत सामग्री बांटने का दिखावा करती है सरकार। जिस तरह के लोगों से बचाने को उत्तराखंड मांगा था, आज वही लोग सत्ता के केंद्र में है। यह बात वक्ताओं ने केवल मंच से ही नहीं की, बल्कि नाट्य मंचन के माध्यम से भी उसे उकेरा। संभव नाट्य मंच के कलाकारों ने व्यवस्था पर निशाना साधा।

पौधे भी रखे गिर्दा की याद में
आगास संस्था के जेपी मैठाणी ने गिर्दा की याद में पौधे भी नगर निगम सभागार के बाहर रखवाए। मकसद यही था कि जो इस स्मृति दिवस को पौधों के रूप में संजोना चाहे, इन्हें यहां से ले जा सके।

प्रदर्शनी में दिखे गिर्दा की इन कविताओं के पोस्टर
इस वक्त जब  हमारे देश में
पेश किए जा रहे हैं
पेड़, पेड़ों के खिलाफ
पानी, पानी के खिलाफ
और
पहाड़, पहाड के खिलाफ
जनता के खिलाफ जनता
खबरों के खिलाफ अखबार
तब तुम इस वक्त
जो हो
जैसे हो
इसके खिलाफ क्यों नहीं हो रहे हो...।

शांति हिमालय धधक रहा है
दुष्टों की करतूतों से
अस्त-व्यस्त है जीवन
इन तस्कर तंत्री भूतों से
जहर के दम पर टिके तंत्र को
उट्ठो भस्मीभूत करो
जन एकता कूच करो...।

आंदोलनकारियों ने भी किया गिर्दा को याद
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच की ओर से भी गिर्दा को तीसरी पुण्यतिथि पर भाव-भीनी श्रद्धांजलि दी गई। गिर्दा की यादों और उनके संदेश को प्रेरणा पुंज करार दिया। श्रद्धांजलि देने वालों में प्रदेश महासचिव रामलाल खंडूडी, जिलाध्यक्ष प्रदीप कुकरेती, जगमोहन नेगी, प्रभात डंडरियाल, धर्मपाल रावत आदि शामिल रहे।

पेंशन के सहारे गिर्दा की संगिनी
गिर्दा ने अपने जीवन में वन, शराब एवं राज्य आंदोलन को अपने गीतों तथा आवाज से जीवंत किया था। उनके सुर आज मेरे प्रेरणास्रोत हैं।

यह कहना है स्वर्गीय गिर्दा की पत्नी हेमलता तिवारी का, जिन्हें पति के कार्य पर गर्व है, लेकिन सरकारी उपेक्षा से दिल में टीस भी।

उनके मुताबिक गिर्दा की मृत्यु के बाद सरकारी नुमाइंदों ने गिर्दा के नाम का स्मारक और संग्रहालय बनाने समेत कई आश्वासन दिए थे, लेकिन आज किसी को यह याद भी नहीं।

पेंशन के सहारे घर चला रही गिर्दा की संगिनी को तमाम सरकारी उपेक्षा के बीच इस बात पर फख्र है कि आम आदमी समेत लोक संस्कृति से जुड़े तमाम लोग गिर्दा की यादों को संजोने में निजी स्तर पर दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

जगत रौतेला के कमरे में गिर्दा संग लिखा था संकल्प
1978 की बात है। अल्मोड़ा में जगत रौतेला के कमरे में गिर्दा के साथ बैठे थे। वहीं संकल्प लिखा कि अर्द्ध सामंती, अर्द्ध पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकेंगे। हथियारों से भी।

साथ में विपिन त्रिपाठी, निर्मल, राजा बहुगुणा सभी थे। तब से अब तक इतना समय गुजर गया। मिल-बैठकर बात करते रहे। व्यवस्था, सुधरने की जगह बिगड़ती चली गई।

शिक्षा से बहुत संबंध न होने के बावजूद अब शैलेश मटियानी के नाम पर पुरस्कार दिए जा रहे हैं। गौरा देवी संसाधनों के लिए जूझती रही। उनके नाम पर कुछ नहीं हुआ, सिवाय एक गौरा देवी कन्या धन योजना चलाए जाने के। अब बड़ा बदलाव चाहिए।
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-राजीव लोचन शाह, वरिष्ठ पत्रकार
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