विधानसभा के दो दिवसीय सत्र में एक बात तो पुख्ता हो गई कि अब गैरसैंण से राज्य की सियासत की दिशाएं तय नहीं होतीं। भाजपा का बिना वजह पहले ही दिन सदन का बहिष्कार करना और सीएम का गैरसैंण को लेकर कुछ घोषणा करने के बजाए विपक्षी दल पर बेमतलब की तोहमतें मढ़ना इस बात का सबूत है।
मजेदार पहलू यह है कि जिन्हें कुछ करना है, वो विपक्ष से प्रस्ताव रखने के लिए कह रहे हैं, जबकि विपक्ष की मंशा भी सियासत से आगे की नहीं दिख रही।
सत्तारूढ़ दल कांग्रेस की गैरसैंण को लेकर कथिक दीर्घकालीन नीतियों पर गौर करें तो सीएम हरीश रावत से उम्मीद थी कि राजधानी न सही, मगर आज गैरसैंण का वजूद जिले में तब्दील तो होगा ही। मगर बानगी देखिए, सीएम ने बस यही राग अलापे रखा कि गैरसैंण में उनकी सरकार ने इतना विशालकाय भवन खड़ा कर दिया।
सीएम दो दिनों में गैरसैंण पर साफ बोल तक नहीं पाए
सीएम हरीश रावत
- फोटो : AmarUjala
दो दिनों में वह यह स्पष्ट नहीं बोल पाए कि सरकार राजधानी या अस्थायी राजधानी बनाने जा रही है। उनकी नियत पर संदेह नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके पास जवाब नहीं था कि जब विधानसभा बना ही दी तो राजधानी की घोषणा भर करने में कौन सी सियासी दिक्कत उनके सामने है।
सीएम के इस मामले में निराशाजनक उत्तर ने पहाड़ के लोगों को निराश किया। इतना ही नहीं हमेशा गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का दम भरने वाले विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के तेवरों से भी तलखी गायब दिखी। कांग्रेस संगठन का इस मामले में कोई स्टैंड नहीं ले पाना यह दर्शाता है कि पहले से ही सब कुछ तय था।
भाजपा ने भी जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को नहीं समझा। पहले ही दिन सदन का बहिष्कार कर गैसैंण से कूच करना इस ओर इशारा करता है कि भाजपा को अब इस मुद्दे की बहुत चिंता नहीं रह गई है।
गैरसैंण में 24 घंटे भी नहीं रुके भाजपा के विधायक
गैरसैंण सत्र
- फोटो : AmarUjala
दिलचस्प पहलू यह है कि गैरसैंण को अस्थायी राजधानी बनाए जाने पर अपने शोर शराबे की मुनादी करने वाली भाजपा के विधायक गैरसैंण में 24 घंटे भी नहीं रूके। जो भाजपा आज गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग कर जनता में सहानुभूति बटोरने की निरर्थक कोशिश कर रही है, उसने अपने सत्ता काल में इस तरफ एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया।
खैर, दोनों दल कितने भी दावे करें, लेकिन फिलहाल गैरसैंण के भविष्य का कोई वारिस नजर नहीं आ रहा है। वरना भाजपा बहुत फिक्रमंद होती और सरकार कुछ घोषणा तो करती ही। सब जानते हैं कि हरीश रावत कैबिनेट में गैरसैंण को राजधानी बनाने पर ही कितने मतभेद हैं।