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दशहरे में यहां रावण नहीं दो बहनों के बनते हैं 'पुतले'

Fri, 23 Oct 2015 04:06 PM IST
ब्यूरो / अमर उजाला, साहिया
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जहां पूरे देश में दशहरे के लिए दशानन रावण के पुतले बनाए जाते हैं, वहीं देहरादून जिले के साहिया में हर साल दो बहनों के पुतले बनाए जाते हैं।
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सदियों पुरानी मान्यता का निर्वहन करते हुए दशहरे के दिन देहरादून जिले के उत्पाल्टा और कुरोली गांव के लोगों के बीच करीब एक घंटे तक भीषण गागली युद्ध हुआ। इसके बाद दोनों गांवों के लोगों ने एक दूसरे को गले मिलकर पाइता पर्व की बधाइयां दीं।

सैकड़ों लोगों ने दो सगी बहनों की घासफूस की प्रतिमा को कुएं में विसर्जित किया। सुबह थाती-माठी (गांव का मूल स्थान) और गांव के कुल देवता बत्तिसर देव की पूजा की गई।
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दशहरे के दिन जब पूरा देश रावण दहन कर अपने अंदर की बुराइयों को खत्म करने का संकल्प लेता है, उसी दिन देहरादून जिले में जौनसार बावर क्षेत्र के दो गांवों में कुछ अलग ही नजारा देखने को मिलता है। इस दिन यहां दशहरे के स्थान पर पाइता पर्व मनाया जाता है। दोनों गांवों के लोग पश्चाताप के रूप में अरबी के डंठलों के गागली युद्ध करते हैं। इस युद्ध में किसी की भी हार जीत नहीं होती है।

परंपरा के अनुसार ग्रामीणों ने दो सगी बहनों रानी और मुन्नी के प्रतीक स्वरूप घासफूस की प्रतिमाएं अष्टमी के दिन बनाईं थी। बृहस्पतिवार को दोनों की प्रतिमाओं को लेकर लोग ढोल नगाड़ों के साथ क्याणी डांडा पहुंचे।

यहां प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित किया गया। इसके बाद लोगों ने गागली (अरबी) के डंठल एक दूसरे पर फेंके। इसे स्थानीय भाषा में हेलरियाट कहा जाता है। करीब एक घंटे तक चले युद्ध के बाद लोगों ने पाइता पर्व की एक-दूसरे को बधाई दी।
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श्राप से मुक्ति का पर्व है पाइता

किवदंतियों के अनुसार करीब 200 साल पहले रानी और मुन्नी नाम की दो बहनें थीं। दोनों साथ-साथ कुएं में पानी भरने जाती थीं। एक दिन रानी की कुएं में गिरने से मौत हो गई। लोगों ने रानी की मौत के लिए मुन्नी को दोषी ठहराया। इससे खिन्न होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी।

बहनों की मौत के श्राप से बचने के लिए लोग महासू देवता की शरण में गए। देवता ने श्राप से बचने के लिए दोनों बहनों की घासफूस की प्रतिमाओं को दशहरे के दिन कुएं में विसर्जित करने की बात कही। तब से उत्पाल्टा में पाइता पर्व मनाने की परंपरा शुरू हो गई।

लोग दशहरे के दिन पश्चाताप स्वरूप गागली युद्ध करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गांव में दशहरे के दिन दो कन्याओं का जन्म नहीं हो जाता तब तक यह परंपरा जारी रहेगी। ताकि गांव को किसी अनहोनी से बचाया जा सके।

एक माह पूर्व शुरू हो जाती है पर्व की तैयारियां
दशहरा पर मनाए जाने वाले इस पाइता पर्व के लिए एक माह पूर्व ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। गागली के डंठलों को काट कर सुखाया जाता है। इसके बाद इन डंठलों का इस्तेमाल लड़ाई के लिए किया जाता है।

कब श्राप मुक्त होगा गांव?
भले ही 200 सालों से दशहरा के दिन इस परंपरा का निर्वहन किया जा रहा हो। लेकिन नई पीढ़ी के लोगों का कहना है कि आखिर कब तक हम इसी तरह से दशहरा के दिन एक दूसरे से लड़कर इस पर्व को मनाते रहेंगे। आखिर हम कब श्रापमुक्त होंगे?

बहनों को लगाते हैं हलवा, पूड़ी का भोग
प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित करने से पहले रानी और मुन्नी की प्रतिमाओं के लिए रोटी, पूड़ी, हलवा और चूड़े तैयार किए जाते हैं। इन्हें भोग स्वरूप प्रतिमाओं को लगाया जाता है।
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