आजाद हिन्द फौज के सेनानी 95 वर्षीय साधू सिंह बिष्ट इस बात के पक्षधर हैं कि सच्ची भावना से समाज सेवा का रखने वालों को सत्ता मिलनी चाहिए।
ब्रितानी हुकूमत से आजादी के लिए जंग में शामिल रहे साधू मानते हैं कि आजादी के बाद जो चुनाव होते थे, उसमें लोग सच्चे समाज सेवा के भाव से काम करते थे, लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टचार और भाई-भतीजाबाद के चलते चुनाव के स्तर में गिरावट आई है। चुनाव में ऐसे लोगों को सामने आना चाहिए जिनका जनता और देश के प्रति स्पष्ट विचार हो। वे मौजूदा सियासी हालात से संतुष्ट नहीं है।
डोईवाला ब्लॉक के स्वतंत्रता सेनानी 95 वर्षीय साधू सिंह बिष्ट कान्हरवाला ग्राम सभा के बारूवाला गांव में रहने वाले जंगे आजादी के पुरोधाओं में से एक हैं। राज्य विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद उन्होंने अमर उजाला से लोकतंत्र में चुनाव और स्वतंत्रता आंदोलन के भावों को साझा किया।
राज्य के वर्तमान राजनीतिक हालातों से व्यथित नजर आए बिष्ट की पीड़ा इस बात से झलकी की आज आजादी के लिए सर्वस्व होम करने वाले लोगों को केवल सरकारी औपचारिकताओं में रखा जाता है। बकौल साधू, देश और प्रदेश के राजनीतिक नुमाइंदे जब तक सार्थक चिंतन नहीं करेंगे तब तक आजादी के यथार्थ मायने सार्थक नहीं हो सकते है।
उन्होंने कहा कि नेताओं को संसद और विधानसभा में हंगामे की प्रवृत्ति को त्यागकर देश और समाज के लिए गंभीर मंथन करना होगा। बिष्ट कहते हैं कि राजनीतिक गिरावट से ही स्वतंत्रता सेनानी और उनके परिवार के लोग हाशिए पर आ गए हैं।
विधानसभा चुनाव के लिए नेताजी सुभाषचंद बोस के विजन के साथ अपनी मंशा व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि सच्ची भावना से समाज सेवा का भाव रखने वाले लोगों को ही सत्ता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य का हनुमान बनकर काम करने वाले लोगों को ही जनता को प्राथमिकता में रखना होगा तभी लोकतंत्र में चुनाव की संकल्पना को साकार रूप मिल सकता है।