उन्होंने महात्मा गांधी के करो या मरो आंदोलोन में भी सक्रिय रूप से भागीदारी की। छात्र जीवन में वह 10 अगस्त 1942 में अन्य सेनानियों के साथ लैंसडौन में गिरफ्तार हुए। 11 अगस्त को उन्हें बिजनौर जिला जेल भेज दिया गया।
धारा 26 में चले मुकदमे में डेढ़ वर्ष तक बिजनौर जिला जेल में नजरबंद कर दिए गए। धारा 52 में भी उन पर मुकदमा चला। जज ने तब उन्हें दो माह की सख्त कैद की सजा भी सुनाई।