विकासनगर। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिषेक कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के थाना टांडा क्षेत्र के अब्बासनगर निवासी पूर्व सर्वे लेखपाल मुरारी सिंह को सरकारी अभिलेख में छेड़छाड़ कर फर्जी दस्तावेज तैयार करने और धोखाधड़ी के आरोप से बरी कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। करीब 18 साल पुराने मामले में अदालत ने सुनाया गया।
अभियोजन के अनुसार मुरारी सिंह विकासनगर में सर्वे लेखपाल के पद पर तैनात थे। आरोप था कि 21 फरवरी 2008 से पहले ग्राम बादामवाला की फसली वर्ष 1399-1404 की खाता संख्या 483 में ओवरराइटिंग कर रूपराम पुत्र मदीराम के स्थान पर केवल मदीराम अंकित किया गया। सहायक अभिलेख अधिकारी के आदेश पर सर्वे नायब तहसीलदार श्याम देव ने 30 मई 2008 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी। विवेचना के बाद पुलिस ने फर्जी दस्तावेज तैयार करने के आरोप में आरोप पत्र दाखिल किया। 29 अक्तूबर 2018 को आरोप तय हुए और 7 अगस्त 2019 से साक्ष्य शुरू हुए।
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गवाहों के बयान बने अभियोजन की कमजोरी
न्यायालय ने पाया कि अभियोजन के गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं। वादी श्याम देव ने प्रतिपरीक्षा में कहा कि यह जरूरी नहीं कि ओवरराइटिंग मुरारी सिंह ने ही की हो। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि रिपोर्ट उच्चाधिकारियों के दबाव में दर्ज कराई गई थी। भोलाराम समेत अन्य गवाहों ने भी यह स्पष्ट नहीं किया कि खतौनी में छेड़छाड़ किसने की। कई गवाहों ने पुनरीक्षित खतौनी में ओवरराइटिंग नहीं होने की बात कही।
दस्तावेजों तक कई लोगों की पहुंच
गवाहों के अनुसार विवादित दस्तावेज एक बक्से में रखे जाते थे और उसकी चाबी दो लोगों के पास रहती थी। मुरारी सिंह के अलावा अन्य लोगों की भी अभिलेखों तक पहुंच थी। साथ ही गवाहों ने बताया कि बेसिक खतौनी तहसील के लेखपाल बनाते हैं, जबकि घटना के समय आरोपी बंदोबस्त विभाग में तैनात थे। पुनरीक्षित खतौनी में भी ओवरराइटिंग नहीं मिली। ऐसे में छेड़छाड़ के लिए सीधे आरोपी को जिम्मेदार ठहराना संभव नहीं हुआ।
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हस्तलेख जांच न होने से भी उठे सवाल
अदालत ने विवेचना में भी खामियां पाईं। मुरारी सिंह के हस्तलेख के नमूने लेकर विवादित लेख से मिलान कराने का कोई प्रयास नहीं किया गया। विवेचक भी यह स्पष्ट नहीं कर सके कि किन साक्ष्यों के आधार पर कूटरचना का आरोप तय कर आरोप पत्र भेजा गया। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन को आरोप संदेह से परे साबित करना होता है। ऐसा नहीं होने पर संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया।