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खेल का मैदान हो या जिंदगी की जंग, हमेशा फारवर्ड खेले ‘जॉनी’: मीर रंजन नेगी

Sun, 19 Aug 2018 11:29 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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hardayal singh (File Photo)
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सरदार हरदयाल सिंह स्टिक स्पीड और रिस्ट वर्क के जादूगर थे। उनका जीवन काफी झंझावात भरा रहा। वे लेफ्ट फारवर्ड खिलाड़ी थे, लेकिन हालात के सामने कभी ‘लेफ्ट’ होना स्वीकार नहीं किया।

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खेल का मैदान हो या जिंदगी की जंग, हमेशा फारवर्ड नेचर को ही तवज्जो दी। हॉकी के प्रति सरदार हरदयाल सिंह उर्फ जॉनी के जुनून का ही नतीजा था कि उन्होंने करियर फौज में क्लर्क की नौकरी से शुरू किया और अपने हुनर की बदौलत मेलबर्न ओलंपिक के हीरो बनकर उभरे। हमेशा से उनका प्रयास रहा कि देश में हॉकी के हुनरमंदों की एक फौज खड़ी हो। पूर्व हॉकी खिलाड़ी मीर रंजन नेगी कुछ इसी अंदाज में हरदयाल सिंह को याद कर भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि सरदार का सपना आज भी अधूरा है। जो सरकारें बात-बात पर अनुदानों का पिटारा खोल देती हैं, उनके कोष इस महान खिलाड़ी के लिए हमेशा खाली रहे।

सरदार हरदयाल सिंह से जुड़ी यादें किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं हैं। उनसे जुड़ी घटनाओं की चर्चा करते हुए पूर्व हॉकी खिलाड़ी मीर रंजन नेगी का गला भर आया। मीर रंजन की कहानी तो लोगों ने बड़े पर्दे पर चक दे इंडिया फिल्म में देखी है, लेकिन हरदयाल सिंह की याद ने मानो मीर रंजन नेगी के जख्मों को हरा सा कर दिया। रुंधे गले से वह पूछ बैठते हैं कि हॉकी को अपना जीवन समर्पित करने वाले खिलाड़ी की यही नियति होती है? सच्चाई यह है कि जिन्हें जवाब देना चाहिए वे मौन हैं। जिस राजनीति से जीवनभर हरदयाल सिंह दूर भागते रहे, उसी सियासी फितरत ने खेल और खिलाड़ी दोनों को खोखला कर दिया है। मीर रंजन नेगी बताते हैं कि सरदार हरदयाल से उनकी आखिरी मुलाकात एनआईएस (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स) पटियाला में हुई थी।
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जितनी देर साथ रहे चर्चा सिर्फ हॉकी के इर्दगिर्द घूमती रही। नेगी ने कहा कि वह उनसे बहुत वरिष्ठ खिलाड़ी रहे। ऐसे लोग हमेशा आदर्श के रूप में याद किए जाते हैं। सरदार हरदयाल हॉकी फेडरेशन में सियासत से चिढ़े रहते थे। उनका मानना था कि महिला हॉकी का अलग फेडरेशन हो और उसका नेतृत्व महिलाएं ही करें। मीर रंजन नेगी क्षोभ में स्वीकार करते हैं कि सरदार जैसे लोगों की उपेक्षा देखकर कौन युवाओं को हॉकी खेलने की सलाह देगा। जिस व्यक्ति ने हॉकी के आगे परिवार और व्यक्तिगत हित को परे रख दिया, उसे सरकारों की उपेक्षा का भारी दंश झेलना पड़ा। सरकारों को चाहिए कि हरदयाल सिंह सरीखे लोगों को राजनीति से हटकर रखना चाहिए। वह चाहते थे कि उत्तराखंड सरकार सहयोग करे तो दूरदराज क्षेत्रों की प्रतिभाओं को हॉकी का साझा मंच मुहैया कराया जाए। 

हरदयाल को गेंद मिली तो उन्हें पकड़ना मुश्किल होता था...
ब्रिगेडियर आईएस गाखल (अप्र) के जेहन में भी हरदयाल सिंह से जुड़ी कई यादें हैं। वजह ये भी है कि सरदार के हॉकी करियर ने उनकी ही पलटन में भर्ती होने के बाद गति पकड़ी। गाखल बताते हैं कि वर्ष 1949 में अंबाला की सिख रेजीमेंट में हरदयाल सिंह क्लर्क के रूप में भर्ती हुए थे। उसी दौरान दिल्ली में हो रहे एक हॉकी टूर्नामेंट में हरदयाल का चयन हुआ। उसी मैच के दौरान हरदयाल सिंह और हरिपाल कौशिक की जोड़ी मेलबर्न ओलंपिक के लिए चुनी गई। गाखल बताते हैं कि हरदयाल सिंह लेफ्ट फारवर्ड खेलते थे। उनकी स्टिक स्पीड और रिस्ट वर्क कमाल की थी। गेंद मिलने के बाद उन्हें पकड़ना मुश्किल हो जाता था। इसी हुनर की बदौलत उन्होंने 1956 में मेलबर्न के ओलंपिक में पाकिस्तान को हराकर देश को स्वर्ण पदक दिलाया। सरदार हरदयाल का जीवन एक तरफ हॉकी की सफलता है तो दूसरी ओर पारिवारिक दुखों का बोझ। पत्नी की मौत ब्रेन ट्यूमर से हुई। बेटा भी असमय मृत्यु का शिकार हुआ। इतनी वेदनाओं के बाद भी हरदयाल हॉकी के हित को लेकर जीवनपर्यंत लड़ते रहे। विनम्र स्वभाव, जुझारू तेवर वाले इस शख्स को दोस्त जॉनी कहकर पुकारते थे।

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