भर्ती के मामले में पहले भी विवादों में आए उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में हुई हालिया भर्तियां फिर सवालों के घेरे में आ रहीं हैं। यह संयोग है कि सुनियोजित, भर्ती किए गए दो लोग आयुष मंत्री हरक सिंह रावत से जुड़े हैं। इसके अलावा की गई कुछ अन्य नियुक्तियों में कृपा की बू आ रही है, क्योंकि उन्हें रखने के लिए एक्ट और विभिन्न शासनादेशों का उल्लंघन करके पद सृजित किए गए हैं। यह भी खबर है कि भाजपा के आनुषांगिक संगठन से जुड़े एक बड़े पदाधिकारी के रिश्तेदार भी बृहस्पतिवार को आयुर्वेद विश्वविद्यालय में नौकरी पा जाएंगे। इस पूरे मामले की शिकायत कुछ लोगों ने विभिन्न जिम्मेदार लोगों को भेजी है। आरोप है कि इन नियुक्तियों के लिए विवि ने गुपचुप वेबसाइट पर विज्ञापन जारी किया और भर्ती कर दी। किसी भी समाचार पत्र में यह विज्ञापन प्रकाशित नहीं करवाया गया। अब इन नियुक्तियों के पीछे असल कहानी क्या है, यह तो पूरी जांच के बाद ही पता चल सकेगा। इस मामले में पक्ष जानने के लिए आयुष मंत्री से संपर्क करने की कोशिश की गई। संपर्क नहीं हो सका, जब भी उनका पक्ष प्राप्त होगा, उसे प्रकाशित किया जाएगा।
यह हैं आरोप
-विवि में इंजीनियर का एक पद सृजित किया गया। इस पद पर आंचल रावत को नियुक्ति दे दी गई। वह आयुष मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत की भांजी बतायी जाती हैं।
-आयुष मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के पीआरओ नरेंद्र सेमवाल की पत्नी पिंकी के लिए विवि में मेडिकल रिकॉर्ड टेक्नीशियन का पद बनाया गया। इस पद पर पिंकी को नियुक्ति दे दी गई। इस भर्ती के लिए भी वेबसाइट के विज्ञापन का ही सहारा लिया गया।
-पद न होने के बावजूद विवि में सुरक्षाकर्मी, गनमैन, पीएसओ का पद सृजित किया गया। इसके लिए शासन की कोई अनुमति नहीं ली गई। इन पदों पर सीधे भर्ती कर दी गई।
-वैसे तो शासन स्तर से एक समिति गठित है जो कि सभी नियुक्तियों की जिम्मेदारी संभालती है लेकिन आयुर्वेद विवि में कुलपति की अध्यक्षता में खुद की समितियां गठित कर भर्तियां की गई हैं।
नियुक्तियों से इतर यह भी आरोप हैं
-विवि में जो सिक्योरिटी एजेंसी काम कर रही थी, उसने समय पूरा होने के बाद काम छोड़ दिया। जैसे ही काम छोड़ा तो विवि ने इसकी टेंडर प्रक्रिया कराने के बजाए सीधे किसी अन्य एजेंसी को ठेका दे दिया। बताया जा रहा है कि जिस एजेंसी को ठेका दिया गया है, वह मानक पूरे नहीं करती है। टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ाने के बजाए विवि ने उस एजेंसी को एक और माह की मोहलत दे दी है।
-विवि में कैंटीन का ठेका एक बड़े प्रभावशाली नेता के भाई को दे दिया गया है। यहां भी टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। बिना टेंडर निकाले सीधे ठेका दे दिया गया।
इन नियमों का उल्लंघन
-मुख्य सचिव उत्पल कुमार ने 27 अप्रैल 2018 को एक शासनादेश जारी किया था। इसमें पृष्ठ 10 पर लिखा गया है कि स्वीकृत पदों के सापेक्ष किसी भी दशा में संविदा/दैनिक वेतन/कार्य प्रभारित/नियत वेतन/अंशकालिक या तदर्थ नियुक्तियां बिना शासन की अनुमति कदापि न दी जाएं। स्वीकृत पदों पर सुसंगत नियमावली से इतर की गई नियुक्तियां शून्य मानी जाएंगी। यदि इस प्रकार की कोई नियुक्तियां भविष्य में की गई तो उनके पारिश्रमिक का भुगतान संबंधित अधिकारी के वेतन/पेंशन से किया जाएगा। और संबंधित अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जाएगी।
-आयुर्वेद विश्वविद्यालय के एक्ट के मुताबिक कोई भी नियुक्ति शासन से अनुमोदन लिए बिना नहीं की जा सकती है। यहां किसी भी नियुक्ति में शासन के किसी अधिकारी को भरोसे में नहीं लिया गया।
पहले भी विवादित रही नियुक्तियां
आयुर्वेद विवि में नियुक्तियों का यह विवाद पहला नहीं है। इससे पहले भी असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति विवादों के बाद तीन बार रद्द हुई थी। इसकी भर्ती परीक्षा में पेपर लीक भी हुआ था। बाद में किसी तरह नियुक्तियां हो पाईं।
किसी भी नियुक्ति में मनमानी नहीं हुई है। जिन लोगों को चयन हुआ है, वह उनके प्रभाव के बजाए काबिलियत के आधार पर कमेटी ने किया है। कैंटीन का मामला पहले से ही गड़बड़ था, उसे हटाया गया। चूंकि टेंडर में समय लगता है इसलिए फिलहाल अस्थायी तौर पर किसी को ठेका दिया गया है। जल्द ही इसका टेंडर भी पूरा किया जाएगा।
-डॉ. राजेश कुमार, प्रभारी कुलसचिव, आयुर्वेद विवि
मेरी पत्नी पिंकी ने जो कोर्स किया है, उससे जॉब के दावेदार कम मिलते हैं। विवि ने विज्ञापन प्रकाशित किया तो हमने भी आवेदन करा दिया था। उनका चयन हो गया, इसमें मेरी कोई सिफारिश नहीं है। रही बात मंत्री जी की भांजी की नौकरी की तो उसने भी इसी तरह से आवेदन किया। उनके साथ आए दावेदारों में वह श्रेष्ठ निकली, इसलिए भर्ती हुईं।
-नरेंद्र सेमवाल, पीआरओ, आयुष मंत्री