एक तरफ ग्रीन बोनस की मांग हो रही है, दूसरी तरफ हरियाली को लेकर जमकर लापरवाही बरती जा रही है। विकास योजनाओं के लिए दी गई वन भूमि बांटी गई और जंगल साफ किया गया, उसके बाद जब हरियाली बढ़ाने और क्षतिपूरक वनीकरण की बात आई, तो मामला फिसड्डी साबित हुआ है। प्रदेश में एक-दो नहीं बल्कि 13 हजार हेक्टेयर में क्षतिपूरक वनीकरण होना बाकी है।
प्रदेश में विकास योजनाओं के लिए वन भूमि की मांग लगातार बनी हुई है। करीब 1200 छोटे-बड़े वन भूमि हस्तांतरण के मामले अभी लंबित है। इनमें भी भूमि दी जानी है, क्योंकि वन भूमि देने और जंगल साफ कर विकास कार्य होते हैं, उसकी भरपाई के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने क्षतिपूरक वनीकरण की व्यवस्था की, लेकिन क्षतिपूरक वनीकरण के मामले में वन महकमा फिसड्डी साबित हुआ है।
2011-2012 से जितना भी हर साल लक्ष्य निर्धारित किया गया, उसका आधा भी वन महकमा लक्ष्य पूरा (हरियाली) नहीं कर सका है। इसका अंदाजा केवल 2016-17 वर्ष से लगाया जा सकता है, इस वित्तीय वर्ष में प्रदेश में 3500 हेक्टेयर वन भूमि पर जंगल तैयार करने के लिए पौधरोपण करना था, लेकिन लक्ष्य केवल 1300 हेक्टेयर में ही पूरा हो पाया। मौजूदा समय में प्रदेश में करीब 13 हजार हेक्टेयर में क्षतिपूरक वनीकरण होना बाकी है।
अपर मुख्य वन संरक्षक और कैंपा के सीईओ समीर सिन्हा ने बताया कि क्षतिपूरक वनीकरण का जो भी कार्य बाकी है, उसको योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने का लक्ष्य तय कर दिया गया है। तीन साल के अंदर लक्ष्य को पूरा करने की योजना बनाई गई है। इसमें पहले साल 3500, दूसरे साल 4500 और तीसरे साल 5500 हेक्टेयर पर पौधरोपण करने के निर्देश संबंधित वनाधिकारियों को दिए गए हैं। उनके कार्य की निगरानी की व्यवस्था की गई है।
10 हेक्टेयर हर दिन का टार्गेट
वन विभाग ने तीन सालों में करीब 13 हजार हेक्टेयर क्षतिपूरक वनीकरण का लक्ष्य रखा है, उसके हिसाब से हर दिन 10 हेक्टेयर जमीन पर पौधरोपण करना होगा। तभी लक्ष्य पूरा हो सकेगा।
केंद्र का भी दबाव
कैंपा का के तहत हर साल केंद्र से करीब 170 करोड़ तक की राशि प्रदेश को मिलती है। बताया जाता है कि इस राशि के उपयोग को लेकर केंद्र कुछ हद तक सहमत नहीं था, अभी तक इको टूरिज्म या दूसरी गतिविधियों पर राशि पर खर्च किया जा रहा था, जबकि कैंपा की राशि का इस्तेमाल क्षतिपूरक वनीकरण के लिए ज्यादा होना था। अब विभाग इस बात को भी सुनिश्चित करने में लगा है।