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हर संस्कृति का प्राण होते हैं लोकगीत

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लोकगीत कार्यशाला में बच्चों को जानकारी देतीं लोक गायिका रेखा धस्माना उनियाल।
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देहरादून। लोकगीत किसी भी संस्कृति के प्राण होते हैं। लोकगीतों के माध्यम से हम किसी भी समाज, उसकी संस्कृति, लोक जीवन और सुख-दुख को जान व समझ सकते हैं।
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यह बात केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय और उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज के तत्वावधान में आयोजित 15 दिवसीय लोकगीत प्रशिक्षण कार्यशाला के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि मुख्य शिक्षा अधिकारी आशारानी पैन्यूली ने कही। उन्होंने कहा कि लोक गायिका रेखा धस्माना उनियाल के गीत हमने बचपन में बहुत सुने हैं। वे लोक संगीत की असली ब्रांड एंबेस्डर हैं। आज भी जब मैं उनका गाया ‘मेरु बुड्यो कु ब्यो च रे’ गीत सुनती हूं तो अपने बचपन में खो जाती हूं।
कार्यशाला की प्रशिक्षक और लोक गायिका रेखा धस्माना उनियाल ने बताया कि 23 अगस्त से छह सितंबर तक 15 दिनों की कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें छात्राओं को थडिया, चौंफुला, चांचड़ी समेत उत्तराखंडी लोक संगीत व नृत्य के संबंध में विस्तार से जानकारी दी गई। प्रधानाचार्या नर्वदा राणा और शिक्षिका भावना नैथानी ने कहा कि कार्यशाला से छात्रों को प्रदेश की संस्कृति और लोक संगीत के बारे में विस्तार से जानने का मौका मिला है। इस अवसर पर विद्यालय की शिक्षिकाएं और छात्राएं मौजूद रहीं।
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