विधानसभा के मानसून सत्र का पहला दिन ऐतिहासिक रहा। राज्य गठन के बाद पहली बार प्रश्नकाल रोककर राज्य में आई आपदा पर चर्चा कराई गई। इसमें सत्तापक्ष और विपक्ष ने पूरी सदाशयता दिखाते हुए एक-दूसरे को विचारों को सुना।
दोनों ही पक्ष पहली मर्तबा सदन निर्बाध चलाने के मूड में दिखे। हालांकि नेता प्रतिपक्ष के बोलने के दौरान कुछ सदस्यों ने टोकाटाकी की तो विधानसभा अध्यक्ष ने अपने अधिकारों का प्रयोग कर उन्हें चुप करा दिया। अन्यथा आशंका यही थी कि सदन में सत्ताधारी दल विपक्ष की मांग मानेगा नहीं, और सदन हंगामे की भेंट चढ़ जाएगा। जैसा कि बजट सत्र में हुआ।
सदन को शांतिपूर्वक चलाने में पूरा सहयोग
विपक्ष ने बुधवार को सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल से उनके कक्ष में मुलाकात की और उनको विश्वास दिलाया कि आपदा पर चर्चा स्वीकार की जाती है तो सदन को शांतिपूर्वक चलाने में पूरा सहयोग देंगे। स्पीकर ने इसके लिए उन्हें आश्वस्त किया। सदन की कार्यवाही आरंभ होने पर सबसे पहले जल प्रलय में मारे गए और लापता लोगों के प्रति शोक प्रस्ताव रखा गया और सभी ने दो मिनट का मौन रखा।
कार्य स्थगित करने की व्यवस्था
नेता प्रतिपक्ष ने आपदा पर नियम 310 के तहत कार्य स्थगन प्रस्ताव रखा जिसे स्पीकर ने स्वीकार करते हुए अन्य सभी कार्य स्थगित करने की व्यवस्था दे दी और पूरे दिन आपदा पर चर्चा चलती रही। साथ ही स्पीकर ने ताकीद किया कि इसे भविष्य के लिए उदाहरण न माना जाए।
आपदा पर विपक्ष के साथ ही सत्ताधारी दल के विधायकों ने भी अपनी बात रखी। नेता सदन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने सरकार का पक्ष रखने की बजाए कहा कि आपदा से प्रदेश के ज्यादातर जिले प्रभावित हैं। सभी सदस्यों की बात सदन में आनी चाहिए, वे बाद में सरकार का पक्ष रखेंगे। जिसके चलते सभी को बोलने का मौका दिया गया।
क्या है नियम 310
उत्तराखंड विधानसभा संचालन नियमावली के नियम 310 में काम रोको प्रस्ताव रखे जाते हैं। इसके तहत सदन में लाई जाने वाली सूचना चर्चा के लिए स्वीकार होने पर कार्यसूची के अन्य सभी कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं। इस नियम में वही प्रस्ताव स्वीकार होते हैं, जो अत्यंत महत्व के तात्कालिक अथवा सामयिक विषय के हों। सामान्य तौर पर सदस्यों की ओर से नियम 310 में दी जाने वाली सूचनाओं को नियम 58 में सुना जाता है। नियम 310 की चर्चा के दौरान विपक्ष वोटिंग की भी मांग कर सकता है। ट्रेजरी बेंच (सत्ता पक्ष) में सदस्यों की कम संख्या होने पर सरकार भी खतरे में आ सकती है।
आपदा तो दैवी थी लेकिन सरकार की घोर लापरवाही ने लोगों की जानें ले लीं। यमुनोत्री, हनुमान चट्टी, गंगोत्री, हर्षिल, भटवाड़ी, मुनेरी, केदारधाम, धारचूला और मुनस्यारी में जानमाल का भारी नुकसान हुआ। आपदा ने कुछ गांवों को नक्शे से मिटा दिया और दर्जनों गांव आज भी अलग-थलग पड़े हैं। कई लोगों के परिवार बिछुड़ गए और अब तक सभी को मुआवजा नहीं मिला। उत्तरकाशी में यदि पिछले वर्ष बादल फटने से आया मलबा साफ हो गया होता तो असीगंगा इस बार इतनी तबाही ना मचाती। कई सूचनाएं मिलने के बाद भी सरकार ने लोगों को मरने दिया। इसलिए सरकार पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। सरकार ने वक्तव्य दिया कि लोग अपने रिस्क पर ही उत्तराखंड आए। इससे पूरे देश में राज्य की छवि खराब हुई है।
- अजय भट्ट, नेता प्रतिपक्ष
जब स्पीकर ने दी हिदायत
देहरादून। आपदा के मुद्दे पर जारी चर्चा के बीच कांग्रेस विधायकों ने नेता प्रतिपक्ष के वक्तव्य के बीच में ही व्यवधान डालने की कोशिश की, लेकिन स्पीकर ने साफ कहा कि जब तक नेता प्रतिपक्ष बोल रहे हैं तब तक कोई सदस्य ना बोले। यदि बोलना जरूरी है तो बाद में मौका मिलने पर अपनी बात कहे। इस पर कांग्रेसी विधायक शांत होकर बैठ गए।