फिल्म कांतारा देखकर जगी ढोली की आस
मोहित ने बताया कि जब दक्षिण भारत की फिल्म कांतारा देखी तो लगा इस तरह की संस्कृति तो पूरे पहाड़ में हैं। हमारे पहाड़ की संस्कृति बड़े पर्दे पर अपनी अलग पहचान क्यों नहीं बना सकती। बस यही सोचकर गढ़वाली बोली-भाषा और संस्कृति के लिए कुछ करने का मन बनाया और जुट गए। ढोली फिल्म के बारे में उन्होंने बताया कि फिल्म के लिए उन्होंने ढोल विधा के विशेषज्ञ प्रेमलाल हिंदवाण से प्रशिक्षण लिया। महीनों की कड़ी मेहनत के बाद ही इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं।
मोहित बताते हैं कि गढ़वाली-जौनसारी बोली-भाषा में फिल्में तो बन रही है लेकिन पहाड़ों में थियेटर नहीं होने के कारण ये दूरस्थ गांव के दर्शक तक नहीं पहुंच पाती है। सरकार की ओर से क्षेत्रीय फिल्मों को आगे बढ़ाने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। उसी का नतीजा है कि जहां पहले एक फिल्म को पूरा होने में वर्षों लग जाते थे वो आज कुछ महीनों में ही रिलीज हो जाती है। इससे निश्चित रूप से पहाड़ के युवाओं को रोजगार मिलने के साथ ही हमारी गढ़वाली, कुमाउंनी और जौनसारी बोली-भाषा को भी एक नई पहचान मिलेगी।