सवाल: विशाल जी, आप पेशे से डॉक्टर हैं और उत्तराखंड से भी जुड़े रहे हैं। बाबा नीब करौरी पर फिल्म बनाने का ख्याल कैसे आया? ऐसी फिल्म बनाने के लिए कई तरह के बंधन होते हैं...
जवाब: मैं हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में पोस्टेड था। हम युवा डॉक्टर अक्सर बाइक या कार से पहाड़ों की खूबसूरत वादियों में घूमने निकलते थे। एक दिन नई जगह की तलाश में निकले। बारिश तेज थी, धुंध और ठंड के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हमारे साथ गाड़ी चला रहे डॉक्टर अभिषेक मान को भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हमने कहा, ‘मार ही डालोगे क्या, कुछ दिखाई नहीं दे रहा।’ अचानक कुछ सेकेंड में बारिश रुक गई, धुंध छंट गई और सब साफ दिखाई देने लगा। बगल में नदी बहने की आवाज आ रही थी। गाड़ी का दरवाजा खोला तो सामने वह पुल था, जो मंदिर की ओर जाता था। अचानक धुंध का छंटना, बारिश रुकना और सीधे मंदिर के गेट तक पहुंचना—जो हुआ, वह साधारण नहीं था। हमने हनुमान जी के दर्शन किए और मेरे भीतर बदलाव आया। इसके बाद मैं महाराज जी को समझने और उनकी खोज में जुट गया।
सवाल: पूर्णिमा जी, आपने फिल्म में बाबा जी की धर्मपत्नी रामबेटी का किरदार निभाया। कैसा लगा?
जवाब: फिल्म का हिस्सा बनना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मैं बाबा जी की भक्त रही हूं और राम जी को भी भजती रही हूं। राम नाम लेने से मुझे आस्था और सुकून मिलता है। फिल्म में यह मौका मिला तो मैंने इसे आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया। भूमिका बड़ी नहीं है, लेकिन छोटी-सी भूमिका में जो भाव आप देख रहे हैं, उसे मैंने खुद में अनुभव किया। शायद इसीलिए मैं दर्शकों के करीब पहुंच पाई। इसे बाबा जी का चमत्कार ही मानिए।
सवाल: विशाल जी, फिल्म में कई जगह बंदर दिखाई दिए हैं?
जवाब: पूरी फिल्म की शूटिंग रियल लोकेशन यानी खेत-खलिहान और गांव में हुई। जिस समय बाबा जी हनुमान जी की मूर्ति स्थापित कर रहे थे, उसी दौरान पता नहीं कहां से एक लंगूर आया और मूर्ति के ठीक ऊपर आकर बैठ गया। गांव वालों ने बताया कि 10 साल से यहां बंदर नहीं आया था।