मूसलाधार बारिश के दौरान खेतों की मिट्टी के पोषक तत्वों को बचाने के लिए जरूरी है कि वैज्ञानिक तरीके से खेतों से जल निकासी की जाए। अगर वैज्ञानिक विधि से जल निकासी की गई तो मिट्टी के तत्व बचे रहेंगे और खेतों की उर्वरकता को नुकसान नहीं होगा, जिससे फसलों की पैदावार पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस संबंध में भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान प्रदेश के किसानों को मशविरा दे रहा है।
वर्ष 2013 की आपदा के दौरान गढ़वाल और कुमाऊं मंडल के खेतों को बारिश से सबसे अधिक नुकसान हुआ था। बाढ़ के पानी के साथ बड़ी मात्रा में बही खेतों की मिट्टी के साथ पोषक तत्व भी चले गए। इस पर केंद्रीय जल आयोग ने केंद्र और प्रदेश सरकार को रिपोर्ट दी थी। उसके बाद हर साल बारिश के बाद मिट्टी की उर्वरकता में कमी आ रही है। कृषि विभाग ने भी इस संबंध में रिपोर्ट दी है।
बारिश में खेतों की मिट्टी के पोषक तत्व न बहें इसके लिए भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान किसानों को वैज्ञानिक जल निकासी की सलाह दे रहा है।
संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी एवं कार्यवाहक निदेशक डॉ. एनके शर्मा का कहना है कि बरसाती पानी का सेफ ड्रेेनेज बहुत जरूरी है। पर्वतीय क्षेत्रों के खेतों में मेड़ बना दें और पानी निकालें। जल निकासी के दौरान मेड़ न टूटे। कुछ खेतों में जहां ढलान अधिक है, वहां पुआल बिछा दें।
इससे मिट्टी से वाष्पीकरण अधिक नहीं हो पाएगा। खेतों की अलग-अलग स्थिति के लिहाज से जल निकासी के तरीके अपनाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि इस संबंध में किसानों को मशविरा दिया जा रहा है।