उत्तराखंड में सगंध पादपों की खेती को बढ़ावा दिया जाए तो उद्यमी पहाड़ों पर भी यूनिट लगाने के लिए तैयार हैं। यह कहना है सगंध पौध केंद्र सेलाकुई में आयोजित इंडस्ट्री फारमर मीट में भाग लेने आए उद्यमियों का।
उद्यमी पहाड़ चढ़ने के लिए तैयार
रविवार को अमर उजाला से बातचीत में उद्यमियों ने कहा कि यदि प्रदेश सरकार सगंध पादपों की खेती को बढ़ावा दे और यह खेती परफ्यूमरी इंडस्ट्री की आधे से ज्यादा जरूरतों को पूरा करने लगे तो उद्यमी पहाड़ चढ़ने के लिए तैयार हैं।
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उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड सगंध पौधों के अच्छे बाजार के रूप में उभरा है। यहां पर उगाये जाने वाले एरोमैटिक प्लांटों की बाजार में खासी डिमांड है। बंजर भूमि पर भी इसकी खेती की जा सकती है।
यदि प्रदेश सरकार उद्यमियों की जरूरतों को पूरा करती है तो उद्यमी पहाड़ पर भी यूनिट लगाने के लिए तैयार हैं।
यहां से आए उद्यमी
दिल्ली, मुंबई, बंगलूरू, कन्नौज, कानपुर, लखनऊ, चंदौसी, रामपुर, मुरादाबाद आदि जगहों से कुल 35 उद्यमियों ने शिरकत की।
प्रदेश के आर्थिक विकास में सगंध खेती अहम : अमृता
उत्तराखंड में एरोमैटिक सेक्टर का तेजी से विकास हुआ है। प्रदेश के आर्थिक विकास में भी सगंध पादप महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह बात उद्यान मंत्री अमृता रावत ने रविवार को एक कार्यक्रम में कही।
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सेलाकुई स्थित सगंध पौध केंद्र में इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ इशेंसियल ऑयल फ्रेगरेंसेस एंड फ्लेवर (आईसऑफ) के तत्वावधान में आयोजित इंडस्ट्री फॉरर्मर मीट के दौरान उन्होंने केंद्र में उगाए गए लैमनग्रास, कैमोमिल, चंदन, लैमनबाम, वन अजवाइन आदि पौधों को भी देखा।
एचएनबी गढ़वाल यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और पदमश्री एएन पुरोहित ने कहा कि हर साल एरोमैटिक सेक्टर 16 प्रतिशत के रेट से बढ़ रहा है। एरोमैटिक प्लांट का उपयोग सिर्फ इत्र बनाने के लिए नहीं होता बल्कि इसका उपयोग दवाइयों के साथ ही खाने के लिए भी किया जाता है।
बुलेटिन जारी
संगध पौध केंद्र में आयोजित इंडस्ट्री फारमर मीट के दौरान जापानीमिंट, डैमस्क गुलाब और लेमनग्रास की खेती एवं आसवन तकनीक पर बुलेटिन के साथ ही डाक्यूमेंट्री फिल्म का भी विमोचन किया गया।
तकनीक बुलेटिन में जहां खेती और आसवन तकनीक के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है वहीं डाक्यूमेंट्री में उत्तराखंड में लेहमनग्रास की खेती और उससे होने वाले लाभ के बारे में बताया गया है।
हिमालय की जंगली खरपतवारों पर नजर
राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मार्केट में नेचुरल ऑयल के अभाव को पूरा करने के लिए एरोमेटिक साइंटिस्टों को उत्तराखंड से काफी उम्मीदें हैं। उत्तर भारत के इस छोटे राज्य में ही एरोमेटिक सेक्टर को खड़ा किया गया है।
2003 तक इस राज्य में जहां एरोमेटिक से निकलने वाले तेल का सालाना टर्न ओवर डेढ़ से दो करोड़ था वहीं अब 60 करोड़ रुपए पहुंच गया है।
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यह पहला मौका है कि जब देश भर से आए उद्यमी रानी पोखरी में होने वाली चंदन की खेती से लेकर सेलाकुई स्थित कैप (सगंध पादप केंद्र) में वैज्ञानिकों के साथ सिर खपा रहे हैं।
2003 में स्थापित हुए कैप ने काफी पैर पसारे हैं और आज सालाना 1300 टन नेचुरल ऑयल का उत्पादन होता है। कैप के प्रभारी वैज्ञानिक नृपेंद्र चौहान ने बताया कि जो उत्पाद हिमालय में पैदा होता है उसका विकल्प कहीं और नहीं होता।
अब स्थिति बदली है
पहले केवल राज्य में मिंट समेत एक दो एरोमेटिक की खेती थी लेकिन अब स्थिति बदली है। नौ जंगली खरपतवारों को चिह्नित कर इनके तेल की मार्केटिंग की तैयारी है। यही कारण है कि आज देश भर के ऐरोमेटिक उद्यमियों को उत्तराखंड से काफी उम्मीदें हैं।
खासतौर पर कन्नौज व बुंदेलखंड के इत्र उद्योग की जरूरतें काफी हैं जो कि उत्तराखंड से ही पूरी हो सकती है। लैमनग्रास, जापानी मिंट, डेमस्क गुलाब व कैमोमिल आदि सगंध पादप बिजनेस के लिहाज से किसानों को भी समृद्ध कर रहे हैं।
इनका कहना है
एरोमैटिक सेक्टर के लिए उत्तराखंड अच्छे बाजार के
रूप में उभरा है। यहां के पौधों से तैयार तेल की बाजार में खासी डिमांड है।
जरूरत पूरी हो तो उद्यमी पहाड़ पर भी संयंत्र स्थापित करने के लिए तैयार
हैं।
- एससी वार्ष्णेय, नई दिल्ली
सगंध पौधों से तैयार
तेल की अंतरराष्ट्रीय मार्केट में खासी डिमांड है। राज्य में सगंध पादपों
की खेती को बढ़ावा दिया जाए तो यहां से अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।
- बीएन त्रिपाठी, उद्यमी नई दिल्ली