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इस किसान ने नहीं मानी हार, पक्के इरादे से जीता मुश्किलों का पहाड़

Sun, 04 Sep 2016 02:47 PM IST
सुधांशु द्विवेदी/ अमर उजाला, देहरादून
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jajmohan
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अगर पक्का इरादा कर लिया जाए तो पहाड़ को भी जीता जा सकता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है उत्तरकाशी जिले के साधारण किसान जाजमोहन रावत ने।
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उन्होंने अपने समेत दूसरे किसानों के सेब के बागों को न केवल ढाई किलोमीटर लंबे स्वचालित रोपवे के जरिए सड़क से जोड़ दिया, बल्कि वहीं सेबों की ग्रेडिंग-पैकिंग यूनिट भी लगा दी। इससे समय की बचत के साथ-साथ पूरे गांव के सेब किसानों की आय में कई गुना इजाफा हो गया।

वे इस काम से करीब 25 मजदूरों को रोजगार भी मुहैया करवा रहे हैं। जाजमोहन ने यह सब कर्ज लेकर किया। अब उनके इस कार्य से प्रभावित होकर राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड उनको करीब 25 लाख रुपये से अधिक का अनुदान देने पर विचार कर रहा है।
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मोरी ब्लाक के कोटगांव के ग्रामीणों के सेब के बाग आसपास की पहाड़ियों में फैले हुए हैं जो पगडंडियों के जरिए सड़क से जुड़ते हैं। पहाड़ी उतार-चढ़ाव वाली कीचड़ भरी दुर्गम पगडंडियों से सेब की पेटियां कई किलोमीटर तक पैदल या खच्चर पर लादकर सड़क तक लाना पड़ता था।

क्योंकि व्यापारी सड़क पर ही माल खरीदने को तैयार होते थे। बारिश, रास्ते की खराबी के कारण अक्सर सेब की पेटियां खच्चर की पीठ से फिसल जाती थी, जिससे काफी नुकसान हो जाता था। इसके अलावा खच्चर का भाड़ा भी काफी महंगा होता था।

सड़क से दो दिशाओं के बागों तक लगा दिया रोपवे

- फोटो : Getty Images
इस समस्या को लेकर कई बार शासन-प्रशासन से गुहार लगाई गई पर कोई हल नहीं निकला। इसी बीच जाजमोहन रावत किसी काम से हिमाचल के किन्नौर गए।

वहां उन्होंने देखा कि ऐसे ही दुर्गम में मौजूद बागों से सेब लाने के लिए किसी किसान ने रोपवे लगा रखा है। रावत भारी लागत को देख चिंता में पड़ गए पर योजना बनाते रहे।

इस बीच उत्तराखंड ग्रामीण बैंक उनको 60 लाख की लागत में से 40 लाख का कर्ज देने को तैयार हो गया। बाकी का धन उन्होंने अपनी जमा पूंजी और परिचितों से जुटाया।

जाजमोहन ने सड़क से दो दिशाओं के बागों तक रोपवे लगा दिया। एक डेढ़ किलोमीटर लंबा और दूसरा करीब एक किलोमीटर लंबा। उन्होंने सड़क पर एक स्टोर बनाया जिसमें सेब की पेटियां रखी जा सकें। इसी में उन्नत किस्म की ग्रेडिंग-पैकिंग भी मशीन लगा दी।
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समय और लागत में भारी कमी

जाजमोहन के इस प्रयास से गांव के बागवानों के साथ-साथ बाहर के कारोबारियों को भी सुविधा मिल गई। खच्चर की प्रति पेटी ढुलाई के 40 के बजाय अब करीब तीन रुपये प्रति पेटी की लागत आ गई। वे अन्य किसानों को माल की ढुलाई से लेकर ग्रेडिंग कर पेटियों में पैकिंग करवा कर देते हैं।

इसके लिए प्रति पेटी 170 रुपये वसूल करते हैं। जो कि पहले की लागत की तुलना में काफी कम है। इसके अलावा जो काम हफ्तों तक चलता रहता था, अब कुछ घंटों में सिमट गया। लागत घटने के अलावा कारोबारी भी इस माल को हाथोंहाथ ले रहे हैं। 
 
खुद छठवीं पास, बेटी को पढ़ने भेजा सिंगापुर
जाजमोहन खुद तो छठवीं तक ही स्कूल जा पाए पर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला रहे हैं। उनका बड़ा बेटा पालीटेक्निक कर बागवानी में उनका हाथ बंटा रहा है। जबकि बेटी को सिंगापुर पढ़ने भेजा है। 

विशेषज्ञ टीम के साथ हमने जाजमोहन के गांव जाकर रोपवे, ग्रेडिंग मशीन, स्टोर आदि का स्थलीय निरीक्षण किया है। अनुदान को लेकर अभी प्रक्रिया चल रही है। इस सराहनीय कार्य के लिए पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण कुल लागत के 50 फीसदी तक के अनुदान की स्वीकृति मिल सकती है।
- डॉ. केएन त्रिपाठी, उप निदेशक, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड
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