उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों रुपए के फर्जी तेल बिल घोटाले में सरकार लीपापोती करने में जुट गई है। कई स्तरों पर हुई जांच में घोटाले की पुष्टि के बाद एक और जांच की तैयारी है।
अभी तक हुई जांच में स्वास्थ्य विभाग के साथ ही मुख्यमंत्री कार्यालय को भी दोषी पाया गया है, लेकिन किसी भी कर्मचारी और अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई है। दोषी पाए गए अधिकतर अधिकारी उच्च पदों पर बैठे हैं। ऐसे में एक और जांच की तैयारी का मतलब मामले को लंबा खींचने और दोषियों को बचाने की कोशिश ही कही जा सकती है।
फर्जी तेल बिल घोटाले की अब तक हुई जांच में 2009 से 2014 के बीच देहरादून, हरिद्वार, टिहरी और ऊधमसिंह नगर में सीएमओ और सीएमएस रह चुके 13 अधिकारी दोषी पाए गए हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय और ट्रेजरी के कई तत्कालीन अधिकारी भी संलिप्त पाए गए।
शासन, विभागीय और ऑडिटर स्तर पर हुई जांच में भी घोटाले की पुष्टि हुई है। इतना ही नहीं, चारों जिलों में एफआईआर तक दर्ज हो चुकी है। इतना कुछ होने के बावजूद सरकार ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें उच्च पदों पर बैठाया हुआ है।
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय की संलिप्तता के चलते मामले में कार्रवाई करने से बचा जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि अगर सीएम कार्यालय से जुड़ा मामला नहीं होता तो कई अधिकारियों पर गाज गिर चुकी होती।
अभी तक हुई जांचों की रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्री के समक्ष रखी जा चुकी है। इसमें कई तथ्य स्पष्ट नहीं हैं। शासन अब मामले की जांच किसी अन्य एजेंसी से कराने पर विचार कर रहा है।
- ओमप्रकाश, प्रमुख सचिव, स्वास्थ्य
क्या है फर्जी तेल बिल घोटाला
साल 2009 से 2014 के बीच हुए घोटाले में करीब तीन करोड़ रुपये टैक्सियों के बिल के रूप में भुगतान किए गए। मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश पर चुनाव में टैक्सियां चलाई गई, जिनका बाद में स्वास्थ्य विभाग ने भुगतान किया। मामले में अब तक हुई जांच में तत्कालीन ट्रेजरी कर्मचारी और अधिकारी भी दोषी पाए गए हैं।