नेत्रदान को लेकर ‘अमर उजाला’ की मुहिम रंग ला रही है। गंगानगर के रहने वाले स्वर्गीय विनोद कुमार गुप्ता की कार्निया से कार्नियल अंधता का दंश झेल रहे दो लोगों की अंधेरी दुनिया रोशन होगी।
स्व. गुप्ता की आखिरी इच्छा के मुताबिक उनके पुत्र दीपक गुप्ता ने पिता के नेत्र दान कर दिए थे। अभियान से प्रेरित होकर और लोग भी नेत्रदान के लिए शपथ पत्र भर रहे हैं।
नेत्रदान संबंधी ‘अमर उजाला’ के अभियान से प्रेरित दीपक गुप्ता ने शनिवार को पिता के देहांत की सूचना निर्मल आश्रम आई इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों को दी थी। विशेषज्ञों ने एक घंटे के अंदर पहुंचकर स्व. गुप्ता की कार्निया सुरक्षित कर ली। कार्निया प्रत्यारोपित करने के लिए सोमवार को कार्नियल अंधता से पीड़ित मरीजों को जांच के लिए इंस्टीट्यूट बुलाया गया है। जांच के बाद जिस रोगी के लिए स्व. गुप्ता की कार्निया उचित पाई जाएगी, उसे कार्निया प्रत्यारोपित कर दिया जाएगा।
पार्थिव शरीर पर नहीं पड़ता फर्क
डाक्टरों का कहना है कि आंखें सुरक्षित कर लेने के बाद पार्थिव शरीर पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। व्यक्ति की आंखें लेने के बाद उनके स्थान पर प्लास्टिक की आंखें लगा दी जाती हैं। इससे मृत व्यक्ति का चेहरा उसी तरह नजर आता है। विशेषज्ञों ने बताया कि पार्थिव शरीर से पूरी आंखें लेने के बजाए सिर्फ कार्निया भी सुरक्षित की जा सकती है, लेकिन एहतियातन पूरी आंख ली जाती है। नेत्रदान महान कार्य है जो लोगों को नई जिंदगी देता है।
डाक्टरों का कहना है कि इससे बड़ा कोई पुण्य नहीं होता है।
दो हजार आता है खर्च
कार्निया के ट्रांसप्लांट में रोगी का लगभग दो हजार रुपये खर्च आता है। सात-आठ सौ रुपये पैथोलोजिकल जांचों में खर्च होते हैं। इसके अलावा दवाओं और कन्ज्युमेबिल आइटम में बाकी पैसा खर्च होता है। बीपीएल कार्ड धारक के लिए मुफ्त है।
एनआईआई चला रहा जागरूकता अभियान
निर्मल आश्रम के बैनर तले संचालित निर्मल आई इंस्टीट्यूट में अब तक 14 व्यक्तियों के कार्निया का प्रत्यारोपण हुआ है। इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ चिकित्सक डा. अनुभा अग्रवाल और कॉर्डिनेटर आत्मप्रकाश ने बताया कि संस्थान को 2012 में कॉर्निया प्राप्त करने के लिए राज्य सरकार से मान्यता मिली थी। इस साल चार माह पहले कॉर्निया प्रत्यारोपण की अनुमति मिली है।
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