टूटते रिश्तों को बचाने के लिए उत्तरी भारत के बड़े कानूनविदों ने दून में मंथन किया। वक्ताओं ने पारिवारिक अदालती मामलों के स्थाई और आसान समाधान के लिए समान नागरिक संहिता को जरूरी बताया। कहा कि नागरिक संहिता का विवाह के नियम कायदे एक बड़ा पहलू होते हैं। कानून में एकरूपता न होने के कारण कई तरह की दुश्वारियों का खुद लोगों से लेकर न्यायपालिका तक को सामना करना पड़ता है। देश में बढ़ रहे पारिवारिक अदालती मामलों का परिवार के बच्चों पर असर पर भी गहन चर्चा की गई।
सर्वोच्च न्यायालय की फैमिली कोर्ट कमेटी की ओर से राजपुर रोड स्थित एक होटल में उत्तरी जोन क्षेत्रीय कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इस कांफ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर व लद्दाख, पंजाब व हरियाणा के जज, काउंसलर और अधिवक्ता मौजूद रहे।
इन सभी ने बारी-बारी से पारिवारिक अदालती मामलों में कानून की पेचीदगी, हल और भविष्य की कार्ययोजना पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा समय में देश में कई नागरिक संहिताएं मौजूद हैं। समय-समय पर इनमें बदलाव की आवाज उठती आई है। इस चर्चा में 1980 के दशक के शाह बानो केस का भी जिक्र किया गया। कहा, अलग-अलग कानून होने के कारण पारिवारिक अदालती मामले सुलझने के बजाय उलझ जाते हैं।
ऐसे में इसका स्थाई हल समान नागरिक संहिता हो सकता है। कानून में एकरूपता आने से इस प्रक्रिया को आसान किया जा सकता है। वक्ताओं ने पारिवारिक अदालती मामलों में काउंसलिंग की भूमिका को भी अहम बताया। कहा, यदि काउंसलिंग सही प्रकार हो तो मामले अदालतों में जाने से बच जाएंगे।
एक सत्र में इन मामलों में बच्चों पर पड़ने वाले असर को भी बताया गया। किस तरह पारिवारिक विवाद के चलते उनके बच्चे मानसिक प्रताड़ना से गुजरते हैं और इसका अगला पायदान होता है नशा। इससे न सिर्फ मौजूदा परिवार बल्कि उनका भविष्य भी दांव पर लग जाता है।
मेंटेनेंस के लिए अलग-अलग हैं प्रावधान
वक्ताओं ने कहा कि तलाक के वक्त पत्नी पति पर मेंटेनेंस का दावा करती है। इसके लिए सीआरपीसी में भी प्रावधान है और अन्य कानूनों में भी। कई बार होता यूं है कि लोग इन मामलों को लेकर मजिस्ट्रेट कोर्ट में मुकदमा दायर करते हैं और फिर फैमिली कोर्ट में भी इसी को लेकर लड़ाई लड़ी जाती है। इसके साथ ही विभिन्न विशेष कानूनों में भी मेंटेनेंस के प्रावधान हैं। ऐसे में न्याय पालिका के लिए किसी एक आधार को चुनना बेहद मुश्किल होता है। इससे यह सब आसान होने के बजाय पेचीदा हो जाता है।
उत्तरी क्षेत्र के प्रदेशों की पारिवारिक न्यायालयों में मामलों से निपटने और बच्चों पर इसके असर को कम करने के लिए क्या कुछ किया जा रहा है। इन सभी बातों और अनुभवों पर कांफ्रेंस में चर्चा हुई। कांफ्रेंस के बाद जो भी प्रभावी परिणाम आएंगे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग में लाया जाएगा। ताकि, परिवार के सदस्यों को मजबूत किया जा सके और उन्हें टूटने से बचाया जा सके। - जस्टिस हिमा कोहली, जज सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की फैमिली कोर्ट कमेटी की अध्यक्ष
पूर्व की अपेक्षा वर्तमान में ज्यादा छोटे परिवार होते जा रहे हैं। माता पिता के इन झगड़ों में बच्चे पिस कर रह जाते हैं। इससे बच्चों में तनाव बढ़ता है जिससे वह नशे की ओर भी जा रहे हैं। इसका असर परिवार, समाज और फिर देश पर पड़ता है। बच्चों के प्रति मां-बाप की बराबर की जिम्मेदारी होनी चाहिए। ये एक बड़ा मुद्दा है। इसे लेकर विचार विमर्श इस कांफ्रेंस में किया जा रहा है। ताकि, इसका एक उचित और ठोस समाधान निकल सके। - जस्टिस ऋतु बाहरी, चीफ जस्टिस, उत्तराखंड हाई कोर्ट नैनीताल