-वर्ष 2006 में शीतकालीन वर्षा की कमी से राज्य के 11 जिलों व छह तहसीलों में सूखा, 50 प्रतिशत अधिक फसल प्रभावित।
-वर्ष 2008 में सर्दियों में सूखा, नौ जिलों की 45 तहसीलों के 10,482 गांवों में 50 प्रतिशत फसल चौपट हो गई।
-वर्ष 2009 में सर्दियों में सूखा, 10 जिलों में 57 तहीसलों में सूखे की स्थिति (स्रोत: हिमालय और आपदा जोखिम न्यूनीकरण)।
-1970 के बाद से बाढ़ व भूस्खलन की बड़ी घटनाएं।
- मई 1968 में धौलीगंगा-ऋषिगंगा के संगम के भूस्खलन झील बन गई थी, जिससे तपोवन में भारी नुकसान।
-20 जुलाई 1970 में अलकनंदा घाटी में भारी बाढ़ से बेलाकूची, चमोली व श्रीनगर में भारी तबाही।
-छह व 10 अगस्त में झील से हुए रिसवा से जोशियाड़ा सहित तट पर स्थित कई स्थानों में भारी क्षति।
-दो सितंबर 1978 रुपनि-सुपिन व पब्बर सहित में पानी का भारी जलसंग्रह से यमुना में बाढ़, 272 लोगों की मौत।
-1979 में ऊखीमठ में भूस्खलन से 39 लोग मारे गए।
-1998 मध्य महेश्वर व काली गंगा घाटियों में भूसख्लन से भेंटी व पौंडा गांव मलबे में दबे, 101 मारे गए।
- 18 अगस्त 2003 भारत नेपाल सीमा पर काली घाटी में भूस्खलन से 250 से अधिक लोग मारे गए।
-2010 में बाल्टा, देवली, सुगढ़, स्यानचट्टी, डाबारकोट में भारीत तबाही, कई लोग मारे गए।
-2012 रुद्रप्रयाग के किमाणा व गिरिया में भूस्खलन से 69 लोगों की मौत।
2012 में उत्तरकाशी के असी गंगा में भूस्खलन से पानी रुका, बाढ़ आई और 32 लोगों की जान चली गई।
-2013 उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर, पिथौरागढ़ में बाढ़ से भारी नुकसान, केदारनाथ में 4000 लोगों की मौत।
-04 अगस्त 2017 में कोटद्वार शहर में बाढ़ से छह लोगों की मौत, 350 से अधिक प्रभावित परिवार।
-202 में ऋषिगंगा में बाढ़ से 203 लोगों की मौत या लापता।
(स्रोत : हिमालय और आपदा जोखिम न्यूनीकरण)
उत्तराखंड में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ इस बात का सबूत है कि जलवायु संकट को अब नजरांदाज नहीं किया जा सकता। पिछले 20 सालों में उत्तराखंड ने 50 हजार हेक्टेयर से अधिक फारेस्ट कवर खो दिया है। भूमि उपयोग आधारित वृक्षारोपण पर ध्यान देने से न केवल जलवायु असंतुलन को दूर किया जा सकता है बल्कि राज्य में स्थायी पर्यटन को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।
-अविनाश मोहंती, प्रोग्राम लीडर, सीईईडब्ल्यू
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, तापमान में वृद्धि के कारण उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ रहा है। इससे बार-बार फ्लैश फ्लड आ रहा है। आने वाले सालों में यह राज्य में चल रही 150 करोड़ लागत की प्रमुख बुनियादी संरचना से जुड़ी परियोजनाओं को प्रभावित कर सकता है।
-अरुणाभ घोष, कार्यकारी अधिकारी, सीईईडब्ल्यू