जंगल आपस में कॉरिडोर के जरिए जुड़े हैं। इनसे ही वन्यजीव आवागमन करते हैं। अभी तक वन विभाग के पास करीब ढाई दशक पुराने कॉरिडोर के संबंध में ही जानकारी थी, पर इन सालों में कॉरिडोर किस हालात में हैं, क्या टाइगर समेत दूसरे वन्यजीव इनका इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर नए कॉरिडोर बन गए हैं, कॉरिडोर और आसपास का वास स्थल कैसा है और इन जगहों पर फूड चेन कैसी है, इसके बारे में कोई नई रिपोर्ट वन विभाग के पास नहीं थी।
ऐसे में वन विभाग ने टाइगर कॉरिडोर को केंद्र में रखकर जंगलों को जोड़ने वाले कॉरिडोर का अध्ययन किया है। प्रोजेक्ट इंचार्ज कार्की कहते हैं कि कुमाऊं के कॉरिडोर के अलावा नेपाल और यूपी सीमा के पास स्थित कॉरिडोर का कैमरा ट्रैप आदि के माध्यम से अध्ययन किया गया है। इसमें पता चलता है कि बाघ इन कॉरिडोर का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। मूवमेंट में निरंतरता है। इन जगहों पर वास स्थल भी बढ़िया हैं। बाघ का भोजन हिरन, जंगली सूअर आदि होता है, इनकी भी उपलब्धता है। हिरन समेत अन्य शाकाहारी जानवरों को खाने के लिए भी संबंधित जगहों पर वनस्पति भी पर्याप्त मात्रा में है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की योजना में मदद
जहां पर टाइगर कॉरिडोर हैं, उनके आसपास के क्षेत्रों में मानव आबादी और मानव- वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं के संबंध में भी जानकारी जुटाई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे संघर्ष को कम करने वाली योजनाओं को बेहतर ढंग से बनाने और लागू करने में मदद मिलेगी। अध्ययन रिपोर्ट को मार्च तक सौंपने का लक्ष्य है।
- साउथ पाटी दून-चिल्किया
- चिल्किया- कोटा
- ढिकुली- गर्जिया
- मलानी- कोटा
- फतेहपुर-गदगदिया (निहाल- भाखड़ा)
- गौला रोखड़- गोराई टांडा
- किलपुरा-खटीमा- सुरई
- नखाताल-नेपाल कॉरिडोर
- बूम
- कड़ापानी-सिडकुल
- बौर- दाबका रिवर अपस्ट्रीम कैचमेंट
वन विभाग के पास वन्यजीव कॉरिडोर को लेकर हाल के सालों में तैयार की गई कोई भी रिपोर्ट नहीं है। ऐसे में कॉरिडोर लेकर भी अध्ययन कराने का फैसला किया गया था। इसमें भी कॉरिडोर कितने फंक्शनल रह गए हैं, उनका आने वाले समय में भविष्य क्या होगा, इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखकर अध्ययन कराया जा रहा है। जो जानकारी सामने आ रही है, उसमें कॉरिडोर ठीक स्थिति में मिले हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर मानव-वन्यजीव संघर्ष को भी कम करने में मदद मिलेगी। पहाड़ में किन रास्तों से बाघ पहुंच रहे हैं, उसका भी पता लगाया जा रहा है, यह राज्य का अपने तरह का पहला अध्ययन है।
-डॉ. पराग मधुकर धकाते, सीसएफ वन मुख्यालय व विशेष सचिव मुख्यमंत्री
वन्यजीव कॉरिडोर को लेकर अध्ययन किया जा रहा है। इसमें वास स्थल, फूड चेन समेत सभी पहलुओं को शामिल किया गया है। एनटीसीए के प्रोटोकाल के तहत कैमरा ट्रैप लगाकर अध्ययन हो रहा है। पहाड़ में बाघ के पहुंचने के इलाकों का पता लगाने की भी कोशिश हो रही है, ऐसे कुछ इलाकों के संकेत मिले हैं। काम अंतिम चरण में है। संभावना है कि मार्च तक अध्ययन रिपोर्ट तैयार कर सौंप दी जाएगी।
-जीएस कार्की, प्रोजेक्ट इंचार्ज व पूर्व उप निदेशक