देहरादून की रिस्पना और बिंदाल नदी पर हो रहे अतिक्रमण की ओर प्रशासन व शासन ने आंखें मूंद रखी है। आलम यह है कि सात वर्ष पूर्व लोकायुक्त के निर्देश पर हुए सर्वे की रिपोर्ट भी सचिवालय में दबी हुई है।
यह हाल तब है, जबकि रिपोर्ट में तब दस हजार से अधिक अतिक्रमण चिह्नित किए गए थे। एनडी तिवारी सरकार के कार्यकाल में उत्तराखंड के पहले लोकायुक्त एएस रजा के निर्देश पर वर्ष 2006 में सिंचाई विभाग, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग, एमडीडीए और जिला प्रशासन ने रिस्पना और बिंदाल नदियों का संयुक्त सर्वे किया था।
सर्वे में शहर का बदसूरत चेहरा निकलकर सामने आया। दोनों नदियों की जमीन पर 10 हजार से अधिक अवैध कब्जे और अतिक्रमण पाए गए थे। एक अनुमान के मुताबिक तब लगभग डेढ़ से दो लाख आबादी नदी के प्रवाह क्षेत्र के बीच रह रही थी।
अतिक्रमण हटाने के लिए तत्कालीन लोकायुक्त ने 2006 में ही शासन को रिपोर्ट भेज दी थी, लेकिन इस रिपोर्ट को शासन और सरकार के नुमाइंदों ने दबा दिया। सूत्र बताते हैं कि अब सात साल बाद दोनों नदियों के बीच अतिक्रमण की संख्या लगभग डेढ़ गुना से अधिक हो चुकी है, लेकिन अब भी अतिक्रमण पर नीति नियंता आंखें मूंदे हुए हैं।
वोट बैंक हैं नदियों की बस्तियां
सूत्र बताते हैं कि नदियों में बसी अवैध बस्तियों को नेता और राजनीतिक दल वोट बैंक के रूप में देखते हैं। बस्तियों में रहने वाले लोगों को राजनीतिक दल ही वोटर आईडी, राशन कार्ड मुहैया कराते हैं। बस्तियों में मतदान का प्रतिशत भी काफी अधिक रहता है।
ऐसे में ये वोटर किसी को भी जिताने या हराने की कूवत रखते हैं। यही वजह है कि सरकार चाहे कोई हो, किसी भी सूरत में इन बस्तियों को छेड़ने की कोशिश नहीं करती। नगर निगम चुनाव के दौरान तो कांग्रेस सरकार ने इन बस्तियों को नियमित करने तक की बात कह दी थी।
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