बदलते वक्त के साथ चुनाव प्रचार का स्वरूप भी बदल गया है। कभी लाउडस्पीकर और प्रिंटेड सामग्री के जरिये होने वाला प्रचार अब स्मार्ट फोन पर पहुंच गया है। नुक्कड़ सभाएं, वॉल पेटिंग और लाउडस्पीकर जैसे प्रचार माध्यमों का इस्तेमाल बेहद कम हो गया है।
दशकों से चुनाव प्रक्रिया के गवाह रहे लोगों के अनुसार प्रचार के कई तरीके अब पूरी तरह खत्म हो गए हैं। उनकी जगह नए प्रचार माध्यमों और तरीकों ने ले ली है। आज से दो दशक पहले तक नुक्कड सभाएं, बिल्ले, स्टीकर, बैच, बैनर, झंडियां प्रचार के प्रमुख माध्यम थे। बैनर और लाउडस्पीकर लगाकर तांगे पर प्रचार होता। साथ में घूमने वाले कार्यकर्ता लोगों को पर्चे बांटते और वोट की अपील करते।
तब नेता सार्वजनिक मंचों पर भाषण देकर लोगों के बीच अपनी बात रखते थे। आज ज्यादातर नेताओं को ठीक से बोलना तक नहीं आता। उनके भाषण लिखने वाले जो कागज देते हैं, वह केवल उसे पढ़ते भर हैं।
फिर एक समय आया जब पोस्टर, होर्डिंग और बैनर जैसी प्रिंटेड सामग्री का जमकर इस्तेमाल हुआ। बाद में चुनाव आयोग की सख्ती और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ने के बाद इसका प्रयोग बेहद सीमित हुआ है। दूर-दराज क्षेत्रों में भले ही अभी इसका इस्तेमाल हो रहा हो लेकिन ज्यादातर क्षेत्रों में यह आउटडेटेड हो चुका है।
सोशल मीडिया पर फोकस
आज सभी राजनीतिक दलों का फोकस सोशल मीडिया पर प्रचार करने पर है। इसके लिए राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों ने आईटी एक्सपर्ट्स की टीम तक तैनात की है। यह टीम अपने प्रत्याशी का प्रचार करने के साथ ही विपक्षियों का दुष्प्रचार भी करती है। सोशल मीडिया पर चल रही खबरों, कार्टून, कोट्स और संबंधित घटनाओं के जरिये अपने प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार बनाने का प्रयास किया जाता है।
पब्लिक मीटिंग के अलावा बड़े नेताओं की जनसभा में लोग जुटते थे। ढोल के साथ मुनादी और लाउडस्पीकर से प्रचार होता था। बड़े नेता भी मोहल्लों में छोटी-छोटी सभाओं को संबोधित करते थे। आम कार्यकर्ता के साथ बैठकर चुनाव की रणनीति तय करते थे। चुनाव आयोग की सख्ती के कारण भी वाल पेटिंग जैसे प्रचार के माध्यम अब बेहद सीमित हो गए हैं।
- डा. डीएन भट्टकोटी, राजनीतिक चिंतक
मोहल्लों में छोटी-छोटी सभाएं होती थीं। लाउडस्पीकर के साथ वोट की अपील करते हुए लोगों को बिल्ले, झंडे-डंडे, झंडियां बांटी जाती थी। रेडियो-टेलीविजन को बड़ा प्रचार माध्यम माना जाता था। हालांकि यह केवल बड़े नेताओं की पहुंच में होता था। टेक्नोलॉजी ने चुनाव प्रचार को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। सोशल मीडिया प्रचार का सबसे सशक्त माध्यम बन गया है।
- डा. अजय सक्सेना, विभागाध्यक्ष, राजनीतिशास्त्र डीएवी
पहले तांगों पर लाउडस्पीकर और बैनर लगाकर चुनाव प्रचार किया जाता था। कार्यकर्ता उसके साथ चलते हुए पर्चे बांटते और लोगों के घर-घर जाकर वोट की अपील करते। सबके घर जाकर वोटर नंबर और अपनी प्रचार सामग्री दी जाती। अपना नाम लिखा बैलेट पेपर का प्रारूप देते थे। कुछ कार्यकर्ता अपने पूरे शरीर पर प्रचार सामग्री चिपकाते और झंडा लेते हुए प्रचार करते थे।
- डा. अतुल शर्मा, जनकवि