क्या...? राजेंद्र यादव जी नहीं रहे...? कुछ यही प्रतिक्रिया थी वरिष्ठ साहित्यकार जितेन ठाकुर की, जब उन्हें पता चला कि हंस के संपादक और मशहूर साहित्यकार राजेंद्र यादव नहीं रहे।
तकरीबन 15 दिन पहले अपनी कहानी ‘बुआ की रसोई...’ को लेकर उनकी राजेंद्र यादव से फोन पर बात हुई थी। तब उन्होंने थीम सुनकर कहा था कि अच्छी कहानी है, भेज दो।
1995 में पहली बार दून आए थे
बकौल ठाकुर राजेंद्र यादव से उनका 25 साल का संपर्क रहा। मेरी कहानी ‘आतंक’ हंस में छपी थी। राजेंद्र 1995 में कथाक्रम कार्यक्रम में शिरकत करने पहली बार दून आए थे। उन्होंने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी। इसके बाद भी वह व्यक्तिगत दौरे पर आते रहे।
करीब पांच-सात साल पहले दलित साहित्य अकादमी का सम्मान लेने भी वह दून आए थे। उनमें सबसे अच्छी बात यह थी कि वह अगर कभी फोन किसी कारण से अटैंड नहीं कर पाते थे तो बगैर समय गंवाए उनका रिस्पांस आता था।
कांबोज के समोसे और जलेबी पसंद थे राजेंद्र
दून आने पर राजेंद्र यादव कांबोज के समोसे और जलेबी खाना नहीं भूलते थे। इसके लिए उन्होंने चकराता रोड का चक्कर तो लगाया ही, कई दफा वहां से मंगवाए भी।